शनिवार, 3 जनवरी 2026

*१५. मन कौ अंग ३७/४०*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ३७/४०*
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सुन्दर साधन करत है, मन जीतन कै काज । 
मन जीतै उन सबनि कौं, करै आपनौ राज ॥३७॥
ऐसे साधक अपने मन को जीतने(वश में करने) के लिये अनेक साधनाएँ(उपाय) करते हैं; परन्तु होता इसके विरुद्ध ही है कि मन इन को अपने अधीन कर उनसे अपना अभीष्ट कार्य पूर्ण कर उनको अपने वश में कर लेता है ॥३७॥
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साधन करहिं अनेक बिधि, देहिं देह कौं दण्ड । 
सुन्दर मन भाग्यौ फिरै, सप्त दीप नौ खण्ड ॥३८॥
यद्यपि वे साधक एतदर्थ साधना करते हुए अपने शरीर को नाना प्रकार के कष्ट(दण्ड) देते हैं; परन्तु उन का मन तब भी इतना चञ्चल है कि वह संसार के इस कोण से उस कोण तक(सात द्वीप, नौ खण्ड) दौड़ता ही रहता है ॥३८॥
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सुन्दर आसन मारि कै, साधि रहे मुख मौंन । 
तन कौ राखै पकरि कैं, मन पकरै कहि कौंन ॥३९॥
उनमें से इस मनोनिग्रह के लिये कोई जीवनपर्यन्त किसी एक विशेष आसन लगाकर कठोर तप करता है, या कोई जीवनपर्यन्त मौनव्रत धारण कर संसार से दूर रहने का अभिनय करता है; परन्तु उन से कोई पूछे कि आप में से कितने लोग अपने मन पर निग्रह कर पाये हैं ! ॥३९॥
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तन कौ साधन होत है, मन कौ साधन नांहिं । 
सुन्दर बाहर सब करैं, मन साधन मन मांहिं ॥४०॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सचाई यह है कि इन कठोर उपायों से शरीर को भले ही निगृहीत किया जा सकता है, परन्तु मन को ऐसे किसी भी प्रकार से निगृहीत नहीं किया जा सकता; क्योंकि ये सभी बाह्य साधन स्थूल शरीर को निगृहीत करने में समर्थ ही हैं । सूक्ष्म मन के निग्रह हेतु ऐसे सूक्ष्म साधनों की आवश्यकता होती है जिनसे आन्तरिक साधना की जा सके ॥४०॥
(क्रमशः)

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