मंगलवार, 6 जनवरी 2026

विवेकानन्द व अवतारवाद

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू गुप्त गुण परगट करै, परगट गुप्त समाइ ।*
*पलक मांहि भानै घड़ै, ताकी लखी न जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(१०)श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द व अवतारवाद*
दक्षिणेश्वर मन्दिर में भगवान श्रीरामकृष्ण बलराम आदि भक्तों के साथ बैठे हैं । १८८५ ई., ७ मार्च, दिन के ३-४ बजे का समय होगा ।
भक्तगण श्रीरामकृष्ण की चरणसेवा कर रहे हैं, - श्रीरामकृष्ण थोड़ा हँसकर भक्तों से कह रहे हैं - "इसका(अर्थात् चरणसेवा का) विशेष तात्पर्य है ।" फिर अपने हृदय पर हाथ रखकर कह रहे हैं, "इसके भीतर यदि कुछ है,(चरणसेवा करने पर) अज्ञान-अविद्या एकदम दूर हो जायगी ।"
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एकाएक श्रीरामकृष्ण गम्भीर हुए, मानो कुछ गुप्त बात कहेंगे । भक्तों से कह रहे हैं, "यहाँ पर बाहर का कोई नहीं है । तुम लोगों से एक गुप्त बात कहता हूँ । उस दिन देखा, मेरे भीतर से सच्चिदानन्द बाहर आकर प्रकट होकर बोले, 'मैं ही युग-युग में अवतार लेता हूँ ।' देखा, पूर्ण आविर्भाव; सत्त्वगुण का ऐश्वर्य है ।"
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भक्तगण ये सब बातें विस्मित होकर सुन रहे हैं; कोई कोई गीता में कहे हुए भगवान श्रीकृष्ण के महावाक्य की याद करा रहे हैं –
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
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दूसरे एक दिन, १ सितम्बर १८८५, जन्माष्टमी के दिन नरेन्द्र आदि भक्त आये हैं । श्री गिरीश घोष दो-एक मित्रों को साथ लेकर गाड़ी करके दक्षिणेश्वर में उपस्थित हुए । वे रोते रोते आ रहे हैं । श्रीरामकृष्ण स्नेह के साथ उनकी देह थपथपाने लगे । गिरीश सिर उठाकर हाथ जोड़कर कह रहे हैं, "आप ही पूर्ण ब्रह्म हैं । यदि ऐसा न हो तो सभी झूठा है । बड़ा खेद रहा कि आपकी सेवा न कर सका । वरदान दीजिये न भगवन्, कि एक वर्ष आपकी सेवाटहल करूँ ।"
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बार बार उन्हें ईश्वर कहकर स्तुति करने से श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, "ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए । भक्तवत् न च कृष्णवत्; तुम जो कुछ सोचते हो, सोच सकते हो । अपने गुरु भगवान तो हैं, तो भी ऐसी बात कहने से अपराध होता है ।"
गिरीश फिर श्रीरामकृष्ण की स्तुति कर रहे हैं, "भगवन्, मुझे पवित्रता दो, जिससे कभी रत्तीभर भी पाप-चिन्तन न हो ।"
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श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - "तुम तो पवित्र हो, - तुम्हारी विश्वास-भक्ति जो है ।"
१ मार्च १८८५ ई. होली के दिन नरेन्द्र आदि भक्तगण आये हैं । उस दिन श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र को संन्यास का उपदेश दे रहे हैं और कह रहे हैं, "भैया, कामिनी-कांचन न छोड़ने से नहीं होगा । ईश्वर ही एकमात्र सत्य है और सब अनित्य ।" कहते कहते वे भावपूर्ण हो उठे । वही दयापूर्ण सस्नेह दृष्टि ।
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भाव में उन्मत्त होकर गाना गाने लगे –
संगीत - (भावार्थ) - "बात करने में डरता हूँ", आदि ।
मानो श्रीरामकृष्ण को भय है कि कहीं नरेन्द्र किसी दूसरे का न हो जाय, कहीं ऐसा न हो कि मेरा न रहे - भय है, कहीं नरेन्द्र घर-गृहस्थी का न बन जाय । 'हम जो मन्त्र जानते हैं, वही तुम्हें दिया', अर्थात् जीवन का सर्वश्रेष्ठ आदर्श - सब कुछ त्यागकर ईश्वर के शरणागत बन जाना - यह मन्त्र तुझे दिया ।
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नरेन्द्र आँसूभरी आँखों से देख रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र से कह रहे हैं, "क्या गिरीश घोष ने जो कुछ कहा, वह तेरे साथ मिलता है ?"
नरेन्द्र - मैंने कुछ नहीं कहा, उन्होंने ही कहा कि उनका विश्वास है कि आप अवतार हैं । मैंने और कुछ भी नहीं कहा ।
श्रीरामकृष्ण - परन्तु उसमें कैसा गम्भीर विश्वास है ! देखा ?
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कुछ दिनों के बाद अवतार के विषय में नरेन्द्र के साथ श्रीरामकृष्ण का वार्तालाप हुआ । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, - "अच्छा, कोई-कोई जो मुझे ईश्वर का अवतार कहते हैं - तू क्या समझता है ?"
नरेन्द्र ने कहा, "दूसरों की राय सुनकर मैं कुछ भी नहीं कहूँगा; मैं स्वयं जब समझूँगा तब मेरा विश्वास होगा, तभी कहूँगा ।"
(क्रमशः)

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