बुधवार, 28 जनवरी 2026

*१८. अथ सूरातन कौ अंग १/४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. अथ सूरातन कौ अंग १/४*
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सुन्दर सूरातन करै, सूरबीर सो जांनि । 
चोट नगारै सुनत ही, निकसि मंडै मैदांनि ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जो योद्धा रणक्षेत्र में अपने अद्भुत बल वीर्य का प्रदर्शन करता है, अथवा नगाड़े बजा कर की गयी युद्ध घोषणा सुनते ही युद्धक्षेत्र में पहुँचने की तय्यारी करने लगता है, उसे ही लोग 'शूर वीर' कहते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं ॥१॥
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सुन्दर सूर न गासणा, डाकि पड़ै रण मांहिं । 
घाव सहै मुख सांमहां, पीठि फिरावै नांहिं ॥२॥
ऐसा वीर युद्धक्षेत्र में शत्रुसेना के किसी एक सैनिक को मार कर ही विरत नहीं हो जाता, अपितु वह वहाँ पहुँच कर शत्रुसेना का वध आरम्भ कर देता है; भले ही उस को इसके लिये अपनी छाती पर कितने ही प्रहार सहने पड़ें(इतने पर भी, वह वहाँ अपनी पीठ नहीं दिखाता, अर्थात् युद्ध से भागता नहीं ।) ॥२॥
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पहरि संजोवा नीसरै, सुणि सहनाई तूर । 
सुन्दर रण मैं रुपि रहै, तबहिं कहावै सूर ॥३॥
जो वीर, रणभेरी की ध्वनि सुनते ही, युद्धोपयोगी साधनों से युक्त होकर, युद्धक्षेत्र में कूद पड़ता है वही 'वीर' कहलाता है ॥३॥
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मुख तैं बैंण न उच्चरै, सुन्दर सूर सुजांण । 
टूक टूक जब ह्वै पडै, सब कोइ करै बखांण ॥४॥
सच्चा योद्धा अपने मुख से अपनी वीरता के विषय में लोगों से लम्बी चौड़ी बातें नहीं करता; अपितु वह जब युद्ध करते हुए शरीर के खण्ड खण्ड में विभक्त होने पर युद्ध क्षेत्र में गिर पड़ता है तब वहाँ उसको देखने वाले दूसरे लोग उस की शौर्यगाथा वीरतापूर्ण शब्दों में सुनाते हैं ॥४॥
(क्रमशः)

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