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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार ।*
*तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*योगवासिष्ठ-पाठ । संकीर्तनानन्द तथा नृत्य*
आज रविवार है । मास्टर शनिवार को आये हैं । बुध तक अर्थात् पाँच दिन मठ में रहेंगे । गृही भक्त प्रायः रविवार को ही मठ में दर्शन करने के लिए आया करते हैं । आजकल बहुधा योगवासिष्ठ का पाठ हुआ करता है । मास्टर ने श्रीरामकृष्ण से योगवासिष्ठ की कुछ बातें सुनी थी । देह-बुद्धि के रहते योगवासिष्ठ के 'सोऽहम्' भाव के अनुसार साधना करने की श्रीरामकृष्ण ने मनाही की थी और कहा था, 'सेव्यसेवक-भाव ही अच्छा है ।'
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मास्टर - अच्छा, योगवासिष्ठ में ब्रह्मज्ञान की कैसी बातें हैं ?
राखाल - भूख-प्यास, सुख-दुःख, यह सब माया है, मन का नाश ही एकमात्र उपाय है ।
मास्टर - मन के नाश के पश्चात् जो कुछ बच रहता है, वहीं ब्रह्म है, क्यों ?
राखाल – हाँ ।
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मास्टर – श्रीरामकृष्ण भी ऐसा ही कहते थे । न्यांगटा ने उनसे यही बात कही थी । अच्छा, राम को वशिष्ठजी ने संसार में रहने के लिए कहा है, क्या ऐसी कोई बात तुम्हें उस ग्रन्थ में मिली ?
राखाल - नहीं, अभी तक तो नहीं मिली । इसमें तो राम को कहीं अवतार ही नहीं लिखा है ।
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यही बातचीत चल रही है, इसी समय नरेन्द्र, तारक तथा एक और भक्त गंगातट से टहलकर आ गये । उनकी इच्छा सैर करते हुए कोन्नगर तक जाने की थी, परन्तु नाव नहीं मिली । सब के सब आकर बैठे । योगवासिष्ठ का प्रसंग फिर चलने लगा ।
नरेन्द्र - (मास्टर से) – बड़ी अच्छी कहानियाँ हैं । लीला की कथा आप जानते हैं ?
मास्टर - हाँ, योगवासिष्ठ में है, मैंने कुछ पढ़ा है । लीला को ब्रह्मज्ञान हुआ था न ?
नरेन्द्र - हाँ, और इन्द्र-अहल्या-संवाद, तथा विदूरथ राजा चाण्डाल हुए - वह कथा ?
मास्टर - हाँ, याद आ रही है ।
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नरेन्द्र - वन का वर्णन भी कितना मनोहर है !
नरेन्द्र आदि भक्तगण गंगा-स्नान को जा रहे हैं । मास्टर भी जायेंगे । धूप देखकर मास्टर ने छाता ले लिया । वराहनगर के श्रीयुत शरच्चन्द्र भी साथ ही गंगा नहाने जा रहे हैं । ये सदाचारी ब्राह्मण युवक हैं । मठ में सदा आते रहते हैं । कुछ दिन पहले वैराग्य धारण करके ये तीर्थाटन भी कर चुके हैं ।
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मास्टर - (शरद से) - धूप बड़ी तेज है ।
नरेन्द्र - तो यह कहो कि छाता ले लूँ ।
(मास्टर हँसते हैं)
भक्तगण कन्धे पर अँगौछा डाले हुए मठ का रास्ता पार कर परामाणिक घाट के उत्तर तरफवाले घाट में नहा रहे हैं । सब के सब गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए हैं । आज ८ मई, १८८७ है । धूप बड़ी तेज है ।
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मास्टर - (नरेन्द्र से) - कहीं लू न लग जाय ।
नरेन्द्र - आप लोगों का शरीर भी तो वैराग्य में बाधक है - है न ? मेरा मतलब है आपका, देवेन्द्रबाबू का –
मास्टर हँसने लगे और सोचने लगे - 'क्या केवल शरीर ही बाधक है ?'
स्नान करके भक्तगण मठ लौटे और हाथ-पैर धोकर श्रीरामकृष्ण के कमरे में (जहाँ श्रीरामकृष्ण की पूजा होती थी) गये । प्रणाम करके श्रीरामकृष्ण के पादपद्मों में प्रत्येक भक्त ने पुष्पांजलि चढ़ायी ।
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पूजा-घर में नरेन्द्र को जाने में कुछ देर हो गयी । श्रीगुरु महाराज को प्रणाम करके नरेन्द्र फूल लेने को बढ़े तो देखा, पुष्पपात्र में फूल एक भी नहीं था । उन्होंने पूछा - 'फूल नहीं है ?' पुष्प-पात्र में दो-एक बिल्वदल बच रहे थे, चन्दन में उन्हें ही डुबाकर अर्पण किया । फिर एक बार घण्टाध्वनि की। अन्त में प्रणाम करके 'दानवों के कमरे' में जाकर बैठे ।
मठ के गुरुभाई अपने आपको भूत तथा दानव कहते थे, क्योंकि भूत दानव शिवजी के अनुयायी हैं । और जिस कमरे में सब एक साथ बैठते थे, उसे 'दानवों का कमरा' कहते थे ।
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जो लोग एकान्त में ध्यान-धारणा और पाठ आदि करते थे, वे लोग दक्षिण ओर के कमरे में रहते थे । काली द्वार बन्द करके अधिकतर उसी कमरे में रहते थे, इसलिए मठ के गुरुभाई उस कमरे को काली तपस्वी का कमरा कहते थे । काली तपस्वी के कमरे के उत्तर तरफ पूजा-घर था । उसके उत्तर ओर जो कमरा था, उसमें नैवेद्य रखा जाता था ।
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उसी कमरे में खड़े होकर लोग आरती देखते और वहीं से भगवान श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करते थे । नैवेद्यवाले कमरे के उत्तर में 'दानवों का कमरा' था । यह कमरा खूब लम्बा था । बाहर के भक्तों के आने पर इसी कमरे में उनका स्वागत किया जाता था । 'दानवों के कमरे' के उत्तर तरफ एक और छोटासा कमरा था । यह 'पान-घर' के नाम से पुकारा जाता था । यहाँ भक्तगण भोजन करते थे ।
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'दानवों के कमरे' के पूर्व कोने में दालान थी । उत्सव होने पर भोजन आदि की व्यवस्था इसी कमरे में की जाती थी । दालान के ठीक उत्तर तरफ रसोईघर था ।
पूजा-घर और काली तपस्वी के कमरे के पूर्व ओर बरामदा था । बरामदे के दक्षिण-पश्चिम कोने में वराहनगर की एक समिति का पुस्तकालय था ।
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ये सब कमरे दुमँजले पर थे । जीने दो थे । एक तो पुस्तकालय और काली तपस्वी के कमरे के बीच से, और दूसरा, भक्तों के भोजन करनेवाले कमरे के उत्तर तरफ । नरेन्द्र आदि भक्तगण इसी जीने से शाम को कभी कभी छत पर जाते थे । वहाँ बैठकर वे लोग ईश्वर-सम्बन्धी अनेक विषयों की चर्चा किया करते थे ।
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कभी भगवान श्रीरामकृष्ण की बातें, कभी शंकराचार्य की, कभी रामानुज की और कभी ईसा मसीह की बातें होती थीं । कभी हिन्दू-दर्शन की बातें होती थीं तो कभी यूरोपीय दर्शन का प्रसंग चलता था, कभी वेदों, कभी पुराणों और कभी तन्त्रों की कथाएँ हुआ करती थीं ।
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'दानवों के कमरे' में बैठकर नरेन्द्र अपने दैवी कण्ठ से परमात्मा के नामों और उनके गुणों का कीर्तन किया करते थे । शरद अपने दूसरे भाइयों को गाना सिखलाते थे । काली वाद्य सीखते थे । इस कमरे में नरेन्द्र कितनी ही बार कीर्तन करते हुए आनन्द करते और आनन्दपूर्वक नृत्य किया करते थे ।
(क्रमशः)

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