शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

*नरेन्द्र तथा शरणागति*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू राम हृदय रस भेलि कर,*
*को साधु शब्द सुनाइ ।*
*जानो कर दीपक दिया,*
*भ्रम तिमिर सब जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*नरेन्द्र तथा शरणागति*
नरेन्द्र वार्तालाप कर रहे हैं । मास्टर भीतर नहीं गये । बड़े घर के पूर्व ओरवाले दालान में टहलते रहे, कुछ अंश सुनायी पड़ रहा था ।
नरेन्द्र कह रहे हैं, 'सन्ध्यादि कर्मों के लिए न तो अब स्थान ही है, न समय ही ।'
एक सज्जन - क्यों महाशय, साधना करने से क्या वे मिलेंगे ।
नरेन्द्र - उनकी कृपा ।
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गीता में कहा है –
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया ॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥"
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“उनकी कृपा के बिना हुए साधन-भजन कहीं कुछ नहीं होता । इसलिए उनकी शरण में जाना चाहिए ।"
सज्जन - हम लोग यदा-कदा यहाँ आकर आपको कष्ट देंगे ।
नरेन्द्र - जरूर, जब जी चाहे, आया कीजिये ।
"आप लोगों के वहाँ, गंगा-घाट में हम लोग नहाने के लिए जाया करते हैं ।"
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सज्जन - इसके लिए हमारी ओर से कोई रोक-टोक नहीं । हाँ, कोई और न जाया करे ।
नरेन्द्र - नहीं, अगर आप कहें तो हम भी न जाया करें ।
सज्जन - नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं; परन्तु हाँ, अगर आप देखें कि कुछ और लोग भी जा रहे हैं तो आप न जाइयेगा ।
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सन्ध्या के बाद फिर आरती हुई । भक्तगण फिर हाथ जोड़कर एकस्वर से 'जय शिव ओंकार' गाते हुए श्रीरामकृष्ण की स्तुति करने लगे । आरती हो जाने पर भक्तगण दानवों के कमरे में जाकर बैठे । मास्टर बैठे हुए हैं । प्रसन्न गुरुगीता का पाठ करके सुनाने लगे । नरेन्द्र स्वयं आकर सस्वर पाठ करने लगे । नरेन्द्र गा रहे हैं –
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षिभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्वरुं तं नमामि ।"
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फिर गाते हैं –
"न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् । 
शिवशासनतः शिवशासनतः ॥
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं वदामि । 
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं भजामि ॥
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं स्मरामि । 
श्रीमत् परं ब्रह्म गुरुं नमामि ॥"
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नरेन्द्र सस्वर गीता का पाठ कर रहे हैं और भक्तों का मन उसे सुनते हुए निर्वात निष्कम्प दीप-शीखा की भाँति स्थिर हो गया । श्रीरामकृष्ण सत्य कहते थे कि 'बंसी की मधुर ध्वनि सुनकर सर्प जिस तरह फन खोलकर स्थिर भाव से खड़ा रहता है, उसी प्रकार नरेन्द्र का गाना सुनकर हृदय के भीतर जो हैं, वे भी चुपचाप सुनते रहते हैं ।' अहा ! मठ के भाइयों की गुरु के प्रति कैसी तीव्र भक्ति है !
(क्रमशः)

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