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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१२१/१२४*
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*मन वच्छ ह्वै चूंखिये, सद्गुरु सुरही१ जाय ।*
*रज्जब पीवे थूण२ दे, दीरघ दरवे गाय ॥१२१॥*
जैसे वच्छा गो१ के स्तनों को पकड़ कर थोबे२ देदे कर दूध चूंखता है तब गो अधिक दूध देती है । वैसे ही साधक ज्ञान प्राप्ति की इच्छा मन में करके गुरु के पास जाता है और शंका होने पर बारम्बार पूछता रहता है तो उसे महान ज्ञान प्राप्त होता है ।
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*सुसंवेद१ गुरु ज्ञान मैं, शिष शिक्षा पढ़ लेय ।*
*जैसे दरपन देखते, दर्श दिखाइ देय ॥१२२॥*
१२२ में योग्य शिष्य ज्ञान प्राप्त करता है यह कहते हैं - गुरु के ज्ञान में भली प्रकार अनुभव१ रहता है । शिष्य जब गुरु-शब्दों को पढ़ता है, तब ही उनसे ज्ञान की शिक्षा मिलती है और जैसे दर्पन देखते ही अपने मुख का दर्शन होता है, वैसे ही ज्ञान द्वारा देखने से ब्रह्म साक्षात्कार होता है ।
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*गुरु घर माँही धन घणा, शिष संग्रह्या न जाय ।*
*जब लग लक्षण न लेन के, युक्ति न उपजे आय ॥१२३॥*
१२३ में अयोग्य शिष्य ज्ञान धारण नहीं कर सकता यह कह रहे हैं - गुरु के अंत:करण रूप घर में ज्ञान तो बहुत है किन्तु जब तक शिष्य के अंत:करण में ज्ञान लेने योग्य युक्ति और लक्षण उत्पन्न नहीं होते तब तक शिष्य से ज्ञान ग्रहण नहीं किया जाता ।
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*बहुत बार बेटे भये, परि पिता न पाया आप ।*
*जन रज्जब जन्मे नहीं, जे गुरु मिल्या न बाप ॥१२४॥*
१२४-१२६ में गुरु की दुर्लभता बता रहे हैं - अनंत बार पुत्र रूप में उत्पन्न तो हुये किन्तु स्वयं गुरु रूप पिता तो अभी तक मिल न सके । यदि गुरु-पिता न मिले तो जन्म होने पर भी नहीं होने के समान ही है, कारण - गुरु द्वारा परमात्मा की प्राप्ति के लिये ही मनुष्य जन्म है । प्रभु प्राप्त न हुये तो नर जन्म निष्फल है ।
(क्रमशः)

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