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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग १३/१६*
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सुन्दर धरती धडहडै, गगन लगै उडि धूरि ।
सूर बीज धीरज धरै, भागि जाइ भकभूरि ॥१३॥
भले ही युद्धभूमि में किसी समय ऐसी स्थिति आ जाय कि भय के कारण भागते हुए हाथियों के पैरों की धमक से पृथ्वी थर्रा उठे, या घोडों की टाप से उड़ी धुल से आकाश मटमैला हो जाय; वैसी स्थिति में भी शूर वीर पुरुष उस युद्धभूमि में धैर्य के साथ डटा रहता है, परन्तु कायर(डरपोक) आदमी भाग जाता है ॥१३॥
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सुन्दर बरछी झलहलैं, छूटै बहु दिसि बांण ।
सूरा पडै पतंग ज्यौं, जहां होइ घंमसांण ॥९४॥
किसी घनघोर युद्ध में चारों ओर भाले चमक रहे हों, या बाणों की बौछार हो रही हो, ऐसी भयङ्कर स्थिति में भी वीर पुरुष अपने शत्रुओं पर, दीपक पर पतङ्ग के समान टूट पड़ता है ॥१४॥
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सुन्दर बाढाली बहैं, होई कडाकडि मार ।
सूर बीर सनमुख रहैं, जहाँ षलक्ंकै सार ॥१५॥
भले ही किसी भयानक युद्ध में तीक्ष्ण धार वाली तलवारों(बाढाली) या अन्य शस्त्रों से सब ओर योद्धा मारे जा रहे हों, ऐसे समय में भी वह वीर वहाँ छाती तान कर शत्रु का दृढता से विरोध करता ही रहता है ॥१५॥
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सुन्दर देखि न थरहरै, हहरि न भागै बीर ।
गहर बड़े घंमसांण मैं, कहर धरै को धीर ॥१६॥
सच्चा वीर किसी युद्ध की भयानकता देख कर भी न काँपता है, न डरता या भागता है; अपितु वह उस युद्ध में आगे से आगे बढ़ता ही जाता है, घबराता नहीं है ॥१६॥
(क्रमशः)

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