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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ४१/४४*
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साधत साधत दिन गये, करहिं और की और ।
सुन्दर एक बिचार बिन, मन नहिं आवै ठौर ॥४१॥
मनोनिग्रह का एकमात्र उपाय : साधना करते करते इतना समय व्यतीत हो गया । इस लम्बी अवधि में तुमने सफलता के विपरीत ही कार्य किया है । महाराज सुन्दरदासजी के मत में, विचार विवेक के अतिरिक्त अन्य किसी भी उपाय से किसी का मन स्थिर(निगृहीत) नहीं हो सकता ॥४९॥
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सुन्दर यह मन रंक ह्वै, कबहूं ह्वै मन राव ।
कबहूं टेढौ ह्वै चलै, कबहूं सूधे पाव ॥४२॥
यह मन, अपनी चञ्चलता के कारण, कभी अपने को दरिद्र मान लेता है और कभी राजा । कभी वृथाभिमान में उन्मत्त हो जाता है तो कभी अनायास ही अतिशय विनयशील(सूधे पाव) बन जाता है ॥४२॥
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सुन्दर कबहूं ह्वै जती, कबहूं कामी जोइ ।
मन कौ यहै सुभाव है, तातौ सियरौ होइ ॥४३॥
कभी यह ऐसा लगता है कि बहुत बड़ा यति(संन्यासी) हो या कभी ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे यह बहुत बड़ा कामभोगी हो । मन का ऐसा स्वभाव ही है कि कभी यह, विचारों से उद्वेलित हो कर, तप्त(उष्ण स्वभाव वाला) प्रतीत होता है, कभी शीतल(सियरौ) स्वभाव वाला ॥४३॥
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पाप पुन्य यह मैं कियौ, स्वर्ग नरक हूं जांउं ।
सुन्दर सब कछु मानि ले, ताही तें मन नांउं ॥४४॥
कभी यह समझने लगता है कि ये सब पाप-पुण्य करने वाला मैं ही हूँ, और कभी समझने लगता है कि इन पाप पुण्यों के कारण, मुझे ही नरक या स्वर्ग भोगना पड़ेगा । महाराज कहते हैं - यह सब कुछ मानता रहता है अतएव इसका नाम 'मन' है ॥४४॥
(क्रमशः)

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