गुरुवार, 29 जनवरी 2026

१४ आचार्य गुलाबदासजी

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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बारहवां १२ अध्याय~१४ आचार्य गुलाबदासजी
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आचार्य उदयरामजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्‍चात् उनके शिष्य गुलाबदासजी महाराज को सब समाज ने मिलकर आश्‍विन कृष्णा १३ बृहस्पतिवार वि. सं. १९३१ को गद्दी पर बैठाया । आपके टीके के दस्तूर पर जयपुर नरेश रामसिंहजी ने घोडा, दुशाला, १००) रु. भेजे । अलवर नरेश मंगलसिंहजी ने हाथी, दुशाला, शिरोपाव, मलमल का  थान आदि भेजे । 
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जोधपुर नरेश ने दुशाला, पारचा थान, १००) रु. भेजे । खेतडी नरेश ने दुशाला, नैन सुख थान, १००) रु. भेजे ।नारायणा दादूद्वारे के मेले पर आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने अपने गुरुदेव आचार्य उदयरामजी महाराज के निमित्त दश हजार रुपये व्यय कर के सब समाज के आये हुये साधुओं को भोजन कराया तथा उन्नीस हजार रुपये पूजा में बांटे ।
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उतराध(हरियाणा) की रामत ~ 
वि. सं. १९३२ में आचार्य गुलाबदासजी महाराज ने अपने शिष्य संत मंडल के सहित उतराध की रामत की । उतराध के स्थानधारी साधुओं ने तथा सेवकों ने आपका सत्कार किया । उतराध के सभी संतों तथा सेवकों को अपने दर्शन तथा सत्संग से आनन्दित करते हुये आप पटियाला के पास पहुँचे । 
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पटियाला गमन ~
पटियाला नगर के बाहर ठहरकर पटियाला नरेश को अपनी मर्यादा के अनुसार अपने आने की सूचना दी । सूचना मिलने पर पटियाला नरेश महेन्द्रसिंहजी राजकीय लवाजमा तथा भक्त मंडल के सहित बाजे गाजे से संकीर्तन करते हुये आचार्य गुलाबदासजी महाराज की अगवानी करने आये ।
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मर्यादानुसार भेंट चढाकर प्रणाम की और आवश्यक प्रश्‍नोत्तर रुप शिष्टाचार होने के पश्‍चात् अति सत्कार से बाजे गाजे और भक्त मंडल के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्यजी को लेकर नगर में प्रवेश किया और नगर के मुख्य बाजार से जनता को आचार्यजी तथा संत मंडल के दर्शन कराते हुये नियत स्थान पर ले जाकर ठहराया । प्रसाद बांट कर शोभा यात्रा समाप्त की । 
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राजा महेन्द्रसिंहजी ने आचार्यजी की सेवा का पूरा- पूरा प्रबन्ध करा दिया और सत्संग आरंभ हो गया । पटियाला का राज परिवार व धार्मिक जनता सप्रेम सत्संग करने लगी । दादूजी महाराज की मधुर वाणी सुनकर सत्संगी लोग परमानन्द में निमग्न हो जाते थे । आचार्य गुलाबदासजी महाराज पटियाला में रहे तब तक अति से भक्त लोगों ने दादूवाणी श्रवण की और जब पधारने लगे तब राजा महेन्द्रसिंहजी ने तथा धार्मिक जनता ने सस्नेह मर्यादानुसार भेंट देकर विदा किया । 
(क्रमशः)  

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