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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग ९/१२*
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सीस उतारै हाथि करि, संक न आनै कोइ ।
ऐसै मंहगे मोल का, सुन्दर हरि रस होइ ॥९॥
इसी प्रकार प्रभुभक्ति का भाव भी बहुत मँहगा है । उसकी प्राप्ति हेतु अपना शिर शेष शरीर से पृथक् कर हाथ में लेना पड़े तब भी भक्त के लिये यह व्यापार कुछ हानिप्रद नहीं है ॥९॥
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सुन्दर तन मन आपनौ, आवै प्रभु कै काम ।
रण मैं तैं भाजै नहीं, करै न लौंन हराम ॥१०॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि कभी मन सहित यह समस्त शरीर प्रभु के हित में समर्पित होने की स्थिति आ जाय तो भी भक्तियुद्ध के वीर योद्धा को इस युद्ध से भागकर अपना विश्वासघात(नमकहरामी) नहीं प्रमाणित करना चाहिये ॥१०॥
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सुन्दर दोऊ दल जुरैं, अरु बाजै सहनाइ ।
सूरा कै मुख श्री चढै, काइर दे फिसकाइ ॥११॥
युद्ध की स्थिति आने पर रणभेरी बजने लगे तथा उभय पक्ष की सेनाएँ एक दूसरे के सम्मुख आकर खड़ी हो जायँ तो ऐसे समय में सच्चे वीर के मुख पर एक विशिष्ट कान्ति या आभा(श्री) चमकने लगती है; और कायर(डरपोक) लोग अपना मुख विचका कर वहाँ से भाग निकलने की सोचने लगते हैं ॥११॥
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सुन्दर हय हींसै जहां, गय गाजै चहुं फेर ।
काइर भागै सटकदे, सूर अडिग ज्यौं मेर ॥१२॥
जिस युद्धभूमि में चारों ओर घोड़े हिनहिना रहे हों, तथा हाथी चिंघाड़ रहे हों, यह सब भयप्रद स्थिति देख कर भले ही कायर लोग डर कर वहाँ से भाग जायँ, परन्तु वीर पुरुष वहाँ सुमेरु पर्वत के समान अचल हो जाता है ॥१२॥
(क्रमशः)

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