रविवार, 25 जनवरी 2026

नरेन्द्रादि का तीव्र वैराग्य

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दर्शन कारण विरहनी, वैरागिन होवै ।*
*दादू विरह बियोगिनी, हरि मारग जोवै ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ३~भक्तों के हृदय में श्रीरामकृष्ण*
*(१)नरेन्द्रादि का तीव्र वैराग्य*
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आज वैशाखी पूर्णिमा है । शनिवार, ७ मई १८८७ ।
गुरुप्रसाद चौधरी लेन, कलकत्ता के एक मकान में नरेन्द्र और मास्टर बैठे हुए वार्तालाप कर रहे हैं । यह मास्टर के पढ़ने का कमरा है । नरेन्द्र के आने के पहले वे Merchant of Venice, Comus, Blackie's Self-culture, यही सब पुस्तकें पढ़ रहे थे । स्कूल में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए पाठ तैयार कर रहे थे ।
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नरेन्द्र और मठ के सब गुरुभाइयों के हृदय में तीव्र वैराग्य झलक रहा है । ईश्वर-दर्शन के लिए सब के सब व्याकुल हो रहे हैं ।
नरेन्द्र - (मास्टर से) - मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता । आपके साथ बातचीत तो कर रहा हूँ, परन्तु जी चाहता है कि उठकर अभी चला जाऊँ ।
नरेन्द्र कुछ देर तक चुप रहे । कुछ समय बाद कहने लगे, "ईश्वर-दर्शन के लिए मैं अनशन कर डालूँगा - प्राण तक दे दूँगा ।"
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मास्टर - अच्छा तो है, ईश्वर के लिए सब कुछ किया जा सकता है ।
नरेन्द्र - अगर भूख न सम्हाल सका तो ?
मास्टर - तो कुछ खा लेना, और फिर से शुरू करना ।
नरेन्द्र कुछ देर तक चुप रहे ।
नरेन्द्र - जान पड़ता है, ईश्वर नहीं है । इतनी प्रार्थनाएँ मैंने की, उत्तर एक बार भी नहीं मिला ।
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"सोने के अक्षरों में लिखे हुए न जाने कितने मन्त्र चमकते हुए मैंने देखे !
"न जाने कितने काली रूप, और दूसरे दूसरे रूप देखे, फिर भी शान्ति नहीं मिल रही है !
"छः पैसे दीजियेगा ?"
नरेन्द्र शोभाबाजार से गाड़ी में वराहनगर मठ जानेवाले हैं, इसीलिए किराये के छ: पैसे चाहिए थे ।
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देखते ही देखते सातू(सातकौड़ी) गाड़ी से आ पहुँचे । सातू नरेन्द्र के ही उम्र के हैं, मठ के किशोर भक्तों को बड़ा प्यार करते हैं, मठ में सब आते-जाते भी हैं । उनका घर वराहनगर मठ के पास ही है, कलकत्ते के किसी आफिस में काम करते हैं । उनके घर की गाड़ी है । उसी गाड़ी से आफिस होकर आ रहे हैं ।
नरेन्द्र ने मास्टर को पैसे वापस कर दिये, कहा, 'अब क्या है, अब सातू के साथ चला जाऊँगा । आप कुछ खिलाइये ।' मास्टर ने कुछ जलपान कराया ।
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उसी गाड़ी पर मास्टर भी बैठे । उनके साथ वे भी मठ जायेंगे । सब लोग शाम को मठ पहुँचे । मठ के भाई किस तरह दिन बिताते और साधना करते हैं, यह देखने की उनकी इच्छा है । श्रीरामकृष्ण किस तरह अपने पार्षदों के हृदय में प्रतिबिम्बित हो रहे हैं यह देखने के लिए कभी कभी मास्टर मठ हो आया करते हैं । निरंजन मठ में नहीं हैं । घर में एकमात्र उनकी माँ बच रही हैं, उन्हें देखने के लिए वे घर चले गये हैं । बाबूराम, शरद और काली पुरी गये हुए हैं- कुछ दिन वहाँ रहेंगे, - उत्सव देखेंगे ।
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मठ के भाइयों की देख-रेख नरेन्द्र ही कर रहे हैं । प्रसन्न कुछ दिनों से कठोर साधना कर रहे थे । उनसे भी नरेन्द्र ने प्रायोपवेशन की बात कही थी । नरेन्द्र को कलकत्ता जाते हुए देख, वे भी कहीं अज्ञात स्थान के लिए चले गये । कलकत्ते से लौटकर नरेन्द्र ने सब कुछ सुना । उन्होंने दूसरे गुरुभाइयों से कहा, 'राजा (राखाल) ने क्यों उसे जाने दिया ?' परन्तु राखाल उस समय मठ में नहीं थे, वे मठ से दक्षिणेश्वर के बगीचे में टहलने चले गये थे । राखाल को सब भाई राजा कहकर पुकारते थे । 'राखालराज' श्रीकृष्ण का एक दूसरा नाम था ।
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नरेन्द्र - राजा को आने दो, मैं उसे एक बार फटकारूँगा कि क्यों उसे जाने दिया । (हरीश से) तुम तो पैर फैलाये लेक्चर दे रहे थे, उसे मना क्यों नहीं कर सके ?
हरीश - (मधुर स्वर से) - तारकदादा ने कहा तो, पर वह चला ही गया ।
नरेन्द्र - (मास्टर से) - देखिये, मेरे लिए बड़ी मुश्किल है । यहाँ भी मैं एक माया के संसार में आ फँसा हूँ । न मालूम वह लड़का कहाँ चला गया !
राखाल दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर से लौट आये हैं । भवनाथ भी उनके साथ गये थे ।
(क्रमशः)

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