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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१७. बचन बिबेक को अंग २०/२२*
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सूरज के आगै कहा, करै जींगणा जोति ।
सुन्दर हीरा लाल घर, ताहि दिखावै पोति ॥२०॥
अरे भाई ! सूर्य के प्रखर प्रकाश के सम्मुख जुगनू की टिमटिमाहट का क्या महत्त्व है ! या जिसके घर में हीरा आदि अगणित रत्नों की राशि एकत्र हो उस के सामने काच के मणियों की माला पहन कर कोई मूर्ख अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन कर क्या प्रशंसा पायगा ! ॥२०॥ (४)
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बांणी मैं बहु भेद है, सुन्दर बिबिध प्रकार ।
शब्द ब्रह्म परब्रह्म कौं, जानै जाननिहार ॥२१॥
वाणी का माहात्म्य : महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - लोक में वाणी के अनेक भेद हैं; क्योंकि यह शब्दब्रह्म परब्रह्म का ही एक अंश है, इस भेद को कोई जानने वाला ही जान सकता है ॥ २१॥
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जा बांणी हरि कौं लियें, सुन्दर वाही उक्त ।
तुक अरु छंद सबै मिलैं, होइ अर्थ संयुक्त ॥२२॥
जिस वाणी में हरि की भक्ति मिश्रित हो, भक्त जनों को वही वाणी बोलनी चाहिये । वह वाणी सार्थक भी होती है, तथा उसकी तुकबन्दी और छन्द आदि सब कुछ ह्रदयग्राही होता है ॥२२॥
(क्रमशः)

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