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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग ४५/४८*
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मन ही बडौ कपूत है, मन ही महा सपूत ।
सुन्दर जौ मन थिर रहै, तौ मन ही अबधूत ॥४५॥
हमारा यह मन कभी कुकृत्य करता हुआ 'कपूत'(कुपुत्र) प्रतीत होने लगता है तथा कभी सत्कृत्य करता हुआ 'सपूत'(सुपुत्र) प्रतीत होता है । यदि यह मन स्थिर(एकाग्र) होकर भगवद्भजन में निरन्तर लगा रहे तो इसे 'अवधूत'(ज्ञानी, सिद्ध पुरुष) भी कहा जा सकता है ॥४५॥
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मन ही यह बिस्तरि रह्यौ, मन ही रूप कुरूप ।
सुन्दर यहु मन जीव है, मन ही ब्रह्म स्वरूप ॥४६॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - यह समस्त संसार हमारे मन का ही विस्तार है । इसी के कारण कभी हमें कोई वस्तु सुरूप(सुन्दर) दिखायी देती है, कभी कुरूप(असुन्दर) । यह मन अपने ही कृत्यों(कल्पनाओं) से कभी 'जीव'(संसार में मुग्ध) दिखायी देता है और कभी(संसार से विरक्ति दिखाता हुआ) यह 'ब्रह्म'(निरञ्जन, निराकार) रूप धारण कर लेता है ॥४६॥
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सुन्दर मन मन सब कहैं, मन जान्यौ नहिं जाइ ।
जौ या मन कौं जांणिये, तौ मन मनहिं समाइ ॥४७॥
इस मन को सभी लोग 'मन' कहते हैं; परन्तु इस मन की यथार्थता(वास्तविकता) कोई नहीं जान पाता । जो बुद्धिमान् इस मन की वास्तविकता को जान ले तो वह मन को उसमें ही लीन(एकाग्र) कर सकता है ॥४७॥
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मन कौ साधन एक है, निस दिन ब्रह्म बिचार ।
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, ब्रह्म होत नहिं बार ॥४८॥
इस मन को एकाग्र(स्थिर) करने का एकमात्र यही उपाय है कि साधक निरन्तर निरञ्जन निराकार प्रभु के ही चिन्तन में लगा रहे । इस निरञ्जन निराकार के चिन्तन से इस मन को निरञ्जन निराकार प्रभुमय होने में कोई विलम्ब नहीं लगता ॥४८॥
(क्रमशः)

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