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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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१२ आचार्य नारायणदास जी ~
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जयपुर नरेश की रसोई ~
वि. सं. १९०९ कार्तिक कृष्णा १ को जयपुर नरेश सवाई रामसिंहजी ने आचार्य नारायणदासजी महाराज को शिष्य मंडल के सहित भोजनार्थ निमंत्रण देकर जिमाने के लिये सत्कार पूर्वक अपने बादल महल में बुलाया और विधि सहित भोजन कराकर ११ स्वर्ण मुद्रा, दुशाला आदि भेंट दी और उदयपुरिया ग्राम भी आचार्यजी के समर्पण किया कहा भी है -
जैपुर नरपति रामने, पधराये निज धाम ।
भक्ति भाव पद पूजके, भेंट चढायो ग्राम ॥
(दादू चरित्र चन्द्रिका)
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उसका पट्टा वि. सं. १९१० फाल्गुण कृष्णा १२ को होकर नारायणा दादूद्वारे में आचार्य नारायणदासजी महाराज के पास आया । नारायणा ग्राम से दक्षिण की ओर चार मील पर पांच सौ बीघा का बीड हैं, उस का पट्टा भी दादूद्वारे के नाम कर दिया गया । उसका पट्टा वि. सं. १९०९ आश्विन शुक्ला १५ को दादूद्वारे को दिया गया । पास के एक कुये पर माली लोग साधुओं को कष्ट देते थे । जयपुर नरेश को यह ज्ञात होने पर १९ बीघा भूमि के साथ कुआ शम्भू वाले का पट्टा भी राज्य से मिला ।
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घाटडे के महन्त का सम्मान ~
वि. सं. १९०९ के नारायणा दादूद्वारे के मेले में आचार्य नारायणदासजी महाराज ने जमात के पंचों के आग्रह से घाटडा के महन्त हरिचरणजी की भेंट लेकर उनको छडी रखने का अधिकार दिया तथा जमातों के ११ अखाडों के महन्तों के समान ही घाटडे के महन्तों का सम्मान करना नियत किया ।
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पूर्वाचार्यों की चरण प्रतिष्ठा ~
आचार्य नारायणादासजी महाराज ने अपने पूर्वाचार्य दिलेरामजी महाराज तथा प्रेमदासजी महाराज के चरणों की प्रतिष्ठा कराकर पूजा बांटी थी । इसी वर्ष सभी जमातों के भेष का धर्म अखाडा बना था और सब जमातों को मिठाई बांटी गई थी । बांटने में कोई भी प्रकार की त्रुटी नहीं होनी जाहिये, इसका पूरा पूरा ध्यान रखने की कर्मचारियों को आज्ञा दी ।
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सांभर गमन ~
वि. सं. १९१० में आचार्य नारायणदासजी महाराज सांभर निजामत के ग्रामों में रामत करते हुये जब सांभर पहुँचे तब जयपुर तथा जोधपुर राज्य के हाकिम और नगर के भक्तों ने बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्य नारायणदासजी महाराज की अगवानी की । आचार्यजी की मर्यादा के अनुसार प्रणामादि शिष्टाचार के पश्चात् संकीर्तन करते हुये नगर के मुख्य बाजार से नगर में लाये और श्री दादू मंदिर पर लाकर ठहराया ।
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फिर आचार्य जी के प्रसाद बांटने पर शोभा यात्रा समाप्त हो गई और जब तक आचार्य नारायणदासजी महाराज सांभर में विराजे तब तक सांभर के भक्तों ने महाराज की सेवा का पूर्ण रुप से ध्यान रखा तथा अति प्रेम से सत्संग किया । सांभर के भक्तों की सेवा की सेवा श्लाघनीय रही । आचार्यजी जब सांभर से पधारने लगे तब उनकी मर्यादा के समान सस्नेह उनको विदा किया ।
(क्रमशः)

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