रविवार, 4 जनवरी 2026

गीतोक्त कर्मयोग

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
.
*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥*
.
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
==================
केवल लोक-शिक्षा के लिए ईश्वर ने उनसे ये सब कर्म करा लिये । अब साधु या संसारी सभी सीखेंगे कि यदि वे भी कुछ दिन एकान्त में गुरु के उपदेशानुसार साधना करके ईश्वर की भक्ति प्राप्त करे, तो वे भी स्वामीजी की तरह निष्काम कर्म कर सकेंगे; सचमुच में अनासक्त होकर दानादि सत्कर्म कर सकेंगे ।
.
स्वामीजी के गुरुदेव श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, "हाथ में तेल मलकर कटहल काटने से हाथ न चिपकेगा ।" अर्थात् एकान्त में साधना के बाद भक्ति प्राप्त करके, ईश्वर का निर्देश पाकर लोकशिक्षा के लिए यदि संसार के काम में हाथ डाला जाय, तो ईश्वर की कृपा से यथार्थ में निर्लिप्त भाव से काम किया जा सकता है ।
.
स्वामी विवेकानन्द के जीवन को ध्यानपूर्वक देखने से 'एकान्त में साधना' तथा 'लोक-शिक्षा के लिए कर्म' किसे कहते हैं इसका पता लगा सकता है । स्वामी विवेकानन्द के ये सब कर्म लोक-शिक्षा के लिए थे ।
कर्मणैव हि संसिद्विमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥
यह गीतोक्त कर्मयोग बहुत ही कठिन है । जनक आदि ने कर्म के द्वारा सिद्धि प्राप्त की थी ।
.
श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे कि जनक ने अपने सांसारिक जीवन के पूर्व, जंगल में एकान्त में बैठकर बहुत कठोर तपस्या की थी । इसलिए साधुगण ज्ञान और भक्ति का पथ अवलम्बन करके, संसार का कोलाहल छोड़कर एकान्त में ईश्वर-साधन करते हैं । स्वामी विवेकानन्द की तरह उत्तम अधिकारी वीर-पुरुष इस कर्मयोग के अधिकारी हैं ।
.
वे भगवान को अनुभव करते हैं, और साथ ही लोकशिक्षा के लिए, ईश्वर का आदेश पाकर संसार में कर्म करते हैं । इस प्रकार के महापुरुष संसार में कितने हैं ? ईश्वर के प्रेम में मतवाले, कामिनी-कांचन का दाग एक भी न लगा हो, परन्तु जीवसेवा के लिए व्यस्त होकर घूम रहे हैं, ऐसे आचार्य कितने देखने में आते हैं ?
.
स्वामीजी ने लन्दन में १० नवम्बर १८९६ को वेदान्त के कर्मयोग की व्याख्या करते हुए गीता का विवरण देते हुए कहा था –
"... और यह आश्चर्य की बात है कि इस उपदेश का केन्द्र है संग्राम-स्थल । यहीं श्रीकृष्ण अर्जुन को इस दर्शन का उपदेश दे रहे हैं और गीता के प्रत्येक पृष्ठ पर यही मत उज्ज्वल रूप से प्रकाशित है - तीव्र कर्मण्यता, किन्तु उसी के बीच अनन्त शान्तभाव । इसी तत्त्व को कर्मरहस्य कहा गया है और इस अवस्था को पाना ही वेदान्त का लक्ष्य है ।..."
- 'व्यावहारिक जीवन में वेदान्त' से उद्धृत
.
भाषण में स्वामीजी ने कर्म के बीच शान्त भाव की बात कही है । स्वामीजी रागद्वेष से मुक्त होकर कर्म कर सकते थे, यह केवल उनकी तपस्या के गुण तथा उनकी ईश्वरानुभूति के बल पर ही सम्भव था । सिद्धपुरुष अथवा श्रीकृष्ण की तरह अवतारीपुरुष हुए बिना यह स्थिरता तथा शान्ति प्राप्त नहीं होती ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें