सोमवार, 26 जनवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१०१/१०४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१०१/१०४*
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*शिष शरीर अंधे अवल, सु गुरु नैन निज ठाट ।* 
*रज्जब चेले चरण चल, इष्ट दृष्ट संग बाट ॥१०१॥*
प्रथम शिष्य शरीर ज्ञान - नेत्र से हीन होने का कारण परमार्थ पथ में अंधे ही होते हैं, फिर श्रेष्ठ गुरु अपने ज्ञान नेत्रों से उनके ज्ञान बनाते हैं, तब परमार्थ पथ में गुरु ज्ञान के संग अर्थात् गुरु उपदेश के अनुसार अपनी वृत्ति रूप चरणों से चलकर अर्थात् उपदेश को धारण करके अपने इष्टदेव ब्रह्म का दर्शन करते हैं ।
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*जे सदगुरु की दृष्टि में, दूर निकट ले पाल ।*
*जन रज्जब दृष्टांत को, कूंज अंड ले न्हाल ॥१०२॥*
यदि शिष्य पर सदगुरु की दया दृष्टि हो तो शिष्य के दूर रहने पर समीप के समान वे उसका पालन करते भी रहते हैं, देखलो, इसमे कूंज पक्षी के अंडे का दृष्टांत प्रसिद्ध है । वह हजारों मील दूर रहकर भी अंडे का पालन अंडकार वृत्ति से ही करता रहता है ।
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*जे सद्गुरु की दृष्टि में, तो गंदा क्यों होय ।*
*जन रज्जब दृष्टांत को, कछवी अंडहि जोय ॥१०३॥*
यदि सद्गुरु की दया दृष्टि में रहे तो शिष्य का हृदय कभी भी मलीन नहीं हो सकता । देखो इसमें कच्छपी के अंडे का दृष्टांत प्रसिद्ध है । कच्छपि अंडो से दूर होते हुये भी उनको देखती रहती है, उसकी दृष्टि मात्र से ही अंडो का पालन होता है ।
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*कछी१ चखी२ कंजी सुरति, अन्य पंखि पंखवाय ।*
*त्रिविधि अंड ज्यों गुरु शिषहुँ, रज्जब निपजे भाय३ ॥१०४॥*
कछुवी१ का अंडा दृष्टि२ से, कूंजी का वृत्ति से, अन्य कुक्कड़ आदि पक्षियों के अंडे पंखो की वायु से पोख पातें है, उक्त तीन प्रकार के अंडे के समान ही गुरु के भाव३ से शिष्य उत्पन्न होते हैं । 
(क्रमशः)

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