सोमवार, 26 जनवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१०५/१०८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१०५/१०८*
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*रज्जब कूंजी काल इत, तो उत अंडे गल जाँहिं ।*
*त्यों सद्गुरु त्यागे सुरति सौ, तो शिष निपजे नाँहिं ॥१०५॥*
यदि इधर उष्ण प्रदेश में कुंजी मर जाय, तो वहाँ हिमालय पर रखे हुये अंडे गल जाते हैं, वैसे ही यदि सद्गुरु अपनी वृत्ति से शिष्य को त्यागता है, तो शिष्य की भक्ति, ज्ञानादि खेती नहीं उत्पन्न होती ।
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*चंचल नग१ निश्चल भया, सद्गुरु पकड़ी बाँह ।*
*रज्जब रह गया शब्द में, ज्ञान कूप मन छाँह ॥१०६॥*
जैसे सूर्य के मार्ग को रोकने के लिये बढ़ते हुये विन्ध्य पर्वत१ को अगस्त्य जी ने रोका था, तब वह वहाँ ही रुक गया था, वैसे ही जब सद्गुरु ने शिष्य की वृत्ति रूप बाँह अपने उपदेश रूप हाथ से पकड़ ली तब जैसे कूप की छाया कूप में ही रहती है, वैसे ही मन सद्गुरु के शब्दों में ही रह गया, अब सत्यत्व भ्रांतिपूर्वक विषयो में नहीं जाता ।
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*मन मनसा पाँचों प्रकृति, गुन ग्रासे गुरु ज्ञान ।*
*जन रज्जब सरवर लहरि, शोष लेय ज्यों भान१ ॥१०७॥*
जैसे सूर्य१, जल शोषण द्वारा सरोवर की लहरियों का शोषण कर लेता है, वैसे ही गुरु का ज्ञान - मन की चपलता, बुद्धि की विपरीतता, पाँचो विषयों का राग, माया की सत्यता, त्रिगुण व क्रोधादि गुण इन सबको नष्ट कर देता है ।
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*आकिल१ गुरु अगस्त्य है, शिष समुद्र मन लीन ।*
*जन रज्जब गुण गण सहित, मुये मनोरथ मीन ॥१०८॥*
अगस्त्य ने समुद्र पान किया तब समुद्र के मच्छी आदि जल जन्तु मर गये थे, वैसे ही ज्ञानी१ गुरु ने शिष्य के मन को भगवान में लीन किया, तब उसके क्रोधादि गुणों के समूह के साथ ही मन के सम्पूर्ण मनोरथ भी नष्ट हो गये ।
(क्रमशः)

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