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*जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव ।*
*दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(९)स्त्रियों को लेकर साधना(वामाचार) के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण और स्वामीजी के उपदेश ~
स्वामी विवेकानन्द एक दिन दक्षिणेश्वर मन्दिर में श्रीरामकृष्णदेव का दर्शन करने गये थे । भवनाथ व बाबूराम आदि उपस्थित थे । २९ सितम्बर १८८४ । घोषपाड़ा तथा पंचनामी के सम्बन्ध में नरेन्द्र ने बात चलायी और पूछा, "स्त्रियों को लेकर वे लोग कैसी साधना करते हैं ?"
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श्रीरामकृष्णदेव ने कहा, "ये सब बातें तुझे सुननी न चाहिए । घोषपाड़ा, पंचनामी और भैरव-भैरवी ये लोग ठीक-ठीक साधना नहीं कर सकते, पतन होता है । ये सब पथ मैले हैं, अच्छे पथ नहीं हैं । शुद्ध पथ पर चलना ही ठीक है । वाराणसी में एक व्यक्ति मुझे भैरवी-चक्र में ले गया था । एक-एक भैरव, और एक-एक भैरवी । वे मुझे शराब पीने के लिए कहने लगे । मैंने कहा, 'माँ, मैं शराब छू नहीं सकता ।'
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वे सब शराब पीने लगे । मैंने सोचा, अब शायद जप-ध्यान करेंगे । लेकिन नहीं, मदिरा पीकर नाचना शुरू कर दिया ।" नरेन्द्र से उन्होंने फिर कहा, "बात यह है, मेरा भाव है मातृ-भाव - सन्तानभाव । मातृभाव अत्यन्त विशुद्ध भाव है, इसमें कोई डर नहीं है । स्त्री-भाव, वीरभाव बहुत कठिन है, ठीक-ठीक रखा नहीं जा सकता, पतन होता है । तुम लोग अपने लोग हो, तुम लोगों से कहता हूँ – मैंने अन्त में यही समझा है - वे पूर्ण हैं, मैं उनका अंश हूँ । वे प्रभु हैं, मैं उनका दास हूँ । फिर कभी कभी सोचता हूँ, वह ही मैं, मैं ही वह । और भक्ति ही सार है ।"
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एक दूसरे दिन(९ सितम्बर १८८३ ई.) दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, "मेरा है सन्तान-भाव । अचलानन्द बीच-बीच में यहाँ पर आकर ठहरता था, खूब मदिरा पीता था । स्त्री लेकर साधन को मैं अच्छा नहीं कहता था, इसलिए उसने मुझसे कहा था, 'भला तुम वीर-भाव का साधन क्यों नहीं मानोगे ? तन्त्र में जो है । - शिवजी का लिखा नहीं मानोगे ? उन्होंने(शिवजी ने) सन्तान-भाव कहा है, फिर वीरभाव भी बताया है ।'
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"मैंने कहा, 'कौन जाने भाई, मुझे वह सब अच्छा नहीं लगता - मेरा सन्तान-भाव ही रहने दो ।'
"उस देश में भगी तेली को इस दल में देखा था - वही औरत लेकर साधन । फिर एक पुरुष के हुए बिना औरत का साधन-भजन न होगा । उस पुरुष को कहते हैं 'रागकृष्ण' । तीन बार पूछता है, 'कृष्ण तूने पा लिया ?' वह औरत भी तीन बार कहती है, 'मैने कृष्ण पा लिया ।'
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एक दूसरे दिन २३ मार्च १८८४ ई. को श्रीरामकृष्ण राखाल, राम आदि भक्तों से कह रहे हैं - "वैष्णवचरण का वामाचारी मत था । मैं जब उधर श्यामबाजार में गया था तो उनसे कहा, 'मेरा मत ऐसा नहीं है ।' मेरा मातृभाव है । देखा कि लम्बी लम्बी बातें बनाता है और फिर साथ ही व्यभिचार भी करता है । वे लोग देवपूजा, मूर्तिपूजा, पसन्द नहीं करते । जीवित मनुष्य चाहते हैं । उनमें से कई राधातन्त्र का मत मानते हैं; पृथ्वीतत्त्व, अग्नितत्त्व, जलतत्त्व, वायुतत्त्व, आकाशतत्त्व - विष्ठा, मूत्र, रज, वीर्य, ये ही सब तत्त्व, यह साधन बहुत मैला साधन है; जैसे पैखाने के रास्ते से मकान में प्रवेश करना ।"
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श्रीरामकृष्ण के उपदेशानुसार स्वामी विवेकानन्द ने भी वामाचार की खूब निन्दा की है । उन्होंने कहा है, "भारतवर्ष के प्रायः सभी स्थानों में विशेष रूप से बंगाल प्रान्त में, गुप्त रूप से अनेक व्यक्ति ऐसी साधना करते हैं । वे वामाचार तन्त्र का प्रमाण दिखाते हैं । उन सब तन्त्रों का त्याग कर लड़कों को उपनिषद, गीता आदि शास्त्र पढ़ने को देना चाहिए ।"
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स्वामी विवेकानन्द ने विलायत से लौटने के बाद शोभाबाजार के स्व. राधाकान्त देव के देव-मन्दिर में वेदान्त के सम्बन्ध में एक सारगर्भित भाषण दिया था, उसमें औरतों को लेकर साधना करने की निन्दा करके निम्नलिखित बातें कही थीं -
"...यह घृण्य वामाचार छोड़ो, जो देश का नाश कर रहा है । तुमने भारत के अन्यान्य भाग नहीं देखे ।
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जब में देखता हूँ कि हमारे समाज में कितना वामाचार फैला हुआ है, तब उन्नति का इसे बड़ा गर्व रहने पर भी मेरी नजरों में यह अत्यन्त गिरा हुआ मालूम होता है । इन वामाचार सम्प्रदायों ने मधुमक्खियों की तरह हमारे बंगाल के समाज को छा लिया है । वे ही, जो दिन को गरजते हुए आचार के सम्बन्ध में प्रचार करते हैं, रात को घोर पैशाचिक कृत्य करने से बाज नहीं आते, और अति भयानक ग्रन्थसमूह उनके कर्म के समर्थक हैं ।
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इन्हीं शास्त्रों की आज्ञा मानकर वे उन घोर दुष्कर्मों में हाथ देते हैं । तुम बंगालियों को यह विदित है । बंगालियों के शास्त्र वामाचार-तन्त्र हैं । ये ग्रन्थ ढेरों प्रकाशित होते हैं, जिन्हें लेकर तुम अपनी सन्तानों के मन को विषाक्त करते हो, किन्तु उन्हें श्रुतियों की शिक्षा नहीं देते । ऐ कलकत्तावासियों, क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती कि अनुवादसहित वामाचार-तन्त्रों का यह बीभत्स संग्रह तुम्हारे बालकों और बालिकाओं के हाथ रखा जाय, उनका चित्त विषविह्वल हो और वे जन्म से यही धारणा लेकर पलें कि हिन्दुओं के शास्त्र ये वामाचार ग्रन्थ हैं ?
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यदि तुम लज्जित हो तो अपने बच्चों से उन्हें अलग करो, और उन्हें यथार्थ शास्त्र - वेद, गीता, उपविषद् - पढ़ने दो । ..."
-'भारत में विवेकानन्द' से उद्धृत
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काशीपुर बगीचे में श्रीरामकृष्ण जब (१८८६ ई.) बीमार थे, तो एक दिन नरेन्द्र को बुलाकर बोले, 'भैया, यहाँ पर कोई शराब न पीये । धर्म के नाम पर मदिरा पीना ठीक नहीं; मैंने देखा है, जहाँ ऐसा किया गया है, वहाँ भला नहीं हुआ ।'
(क्रमशः)

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