गुरुवार, 29 जनवरी 2026

*पिता-पुत्र संवाद । पहले माँ-बाप या पहले ईश्वर ?*

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ ।*
*सजन स्नेही बांधवा, भावै आपा होइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*पिता-पुत्र संवाद । पहले माँ-बाप या पहले ईश्वर ?*
श्रीयुत शशी के पिता आये हुए हैं । उनके पिता अपने लड़के को मठ से ले जाना चाहते हैं । श्रीरामकृष्ण की बीमारी के समय प्रायः नौ महीने तक लगातार शशी ने उनकी सेवा की थी । उन्होंने कालेज में बी. ए. तक अध्ययन किया था । प्रवेशिका में इन्हें छात्रवृत्ति मिली थी ।
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इनके पिता गरीब होने पर भी निष्ठावान् ब्राह्मण हैं और साधना भी करते हैं । शशी अपने माता-पिता के सब से बड़े लड़के हैं । उनके माता-पिता को बड़ी आशा थी कि ये लिख-पढ़कर रोजगार करके उनका दुःख दूर करेंगे; परन्तु इन्होंने ईश्वर-प्राप्ति के लिए सब को छोड़ दिया था । अपने मित्रों से ये रो-रोकर कहा करते थे, 'क्या करूँ, मेरी समझ में कुछ नहीं आता ! हाय ! माता-पिता की मैं कुछ भी सेवा न कर सका ।
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उन्होंने न जाने कितनी आशाएँ की थीं ! मेरी माता को अलंकार-आभूषण पहनने को नहीं मिले । मेरी कितनी साध थी कि उन्हें गहने पहनाऊँगा ! कहीं कुछ भी न हुआ । घर लौट जाना मुझे भार-सा जान पड़ता है । उधर श्रीगुरुमहाराज ने कामिनी-कांचन का त्याग करने के लिए कहा है । अब तो जाने की जगह रही ही नहीं ।'
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श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के पश्चात् शशी के पिता ने सोचा, बहुत सम्भव है, अब वह घर लौटे; परन्तु कुछ दिन घर रहने के पश्चात् जब मठ स्थापित हुआ तब मठ में आते-जाते ही शशी सदा के लिए मठ में रह गये । जब से यह परिस्थिति हुई तब से उनके पिता उन्हें ले जाने के लिए प्रायः आया करते हैं । परन्तु शशी घर जाने का नाम भी नहीं लेते । आज जब उन्होंने यह सुना कि पिताजी आये हुए हैं, वे एक दूसरे रास्ते से नौ दो ग्यारह हो गये ताकि उनसे भेंट न हो ।
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उनके पिता मास्टर को पहचानते थे । वे मास्टर के साथ ऊपरवाले बरामदे में टहलते हुए उनसे बातचीत करने लगे ।
पिता - यहाँ कर्ता कौन है ? यही नरेन्द्र सारे अनर्थों का कारण जान पड़ता है । सब लड़के राजी-खुशी घर लौट गये थे । फिर से स्कूल-कालेज जाने लगे थे ।
मास्टर - यहाँ कर्ता(मालिक) कोई नहीं है । सब बराबर हैं । नरेन्द्र क्या करे ? बिना अपनी इच्छा के क्या कोई आ सकता है ? क्या हम लोग सदा के लिए घर छोड़कर आ सके हैं ?
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पिता - अजी, तुम लोगों ने तो अच्छा किया, क्योंकि दोनों तरफ की रक्षा कर रहे हो, तुम लोग जो कुछ कर रहे हो, इसमें धर्म नहीं है क्या ? हम लोगों की भी तो यही इच्छा है कि शशी यहाँ भी रहे और वहाँ भी रहे । देखो तो जरा, उसकी माँ कितना रो रही है !
मास्टर दुःखित होकर चुप हो गये ।
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पिता - और साधुओं की तलाश में इतना क्यों मारा-मारा फिरता है ? वह कहे तो मैं उसे एक अच्छे महात्मा के पास ले जाऊँ । इन्द्रनारायण के पास एक महात्मा आये हुए हैं, बहुत सुन्दर स्वभाव है । चलें, देखें न ऐसे महात्मा को !
राखाल और मास्टर काली तपस्वी के घर के पूर्व ओर के बरामदे में टहल रहे हैं । श्रीरामकृष्ण और उनके भक्तों के सम्बन्ध में वार्तालाप हो रहा है ।
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राखाल - (व्यस्त भाव से) - मास्टर महाशय, आइये, सब एक साथ साधना करें ।
"देखिये न, अब घर भी सदा के लिए छोड़ दिया है । अगर कोई कहता है, 'ईश्वर तो मिले ही नहीं, फिर क्यों अब यह सब हो रहा है ?' - तो इसका उत्तर नरेन्द्र बड़ा सुन्दर देता है । कहता है, 'राम नहीं मिले तो क्या इसलिए हमें श्याम (अमुक किसी भी) के साथ रहकर लड़के-बच्चों का बाप बनना ही होगा ?' अहा ! एक एक बात नरेन्द्र बड़े मार्के की कह देता है । जरा आप भी पूछियेगा ।"
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मास्टर - ठीक तो है । राखाल भाई, देखता हूँ, तुम्हारा मन भी खूब व्याकुल हो रहा है ।
राखाल - मास्टर महाशय, क्या कहूँ, दोपहर को नर्मदा जाने के लिए जी में कैसी विकलता थी । मास्टर महाशय, साधना कीजिये, नहीं तो कहीं कुछ न होगा । देखिये न, शुकदेव भी डरते थे । जन्मग्रहण करते ही भगे । व्यासदेव ने खड़े होने के लिए कहा, परन्तु वे खड़े भी नहीं होते थे ।
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मास्टर - योगोपनिषद् की कथा है । माया के राज्य से शुकदेव भाग रहे थे । हाँ, व्यास और शुकदेव की कथा बड़ी ही रोचक है । व्यास संसार में रहकर धर्म करने के लिए कह रहे थे । शुकदेव ने कहा, 'ईश्वर के पादपद्मों में ही सार है ।' और संसारियों के विवाह तथा स्त्री के साथ रहने पर उन्होंने घृणा प्रकट की ।
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राखाल - बहुतेरे सोचते हैं, स्त्री को न देखा तो बस फतह है । स्त्री को देखकर सिर झुका लेने से क्या होगा ? कल रात को नरेन्द्र ने खूब कहा, 'जब तक अपने भीतर काम है, तभी तक स्त्री की सत्ता है, अन्यथा स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं रह जाता ।'
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मास्टर - ठीक है । बालक और बालिकाओं में यह भेद-बुद्धि नहीं रहती ।
राखाल - इसलिए तो कहता हूँ, हम लोगों को चाहिए कि साधना करें । माया के पार गये बिना ज्ञान कैसे होगा ? चलिये, बड़े कमरे में चलें । वराहनगर से कुछ शिक्षित मनुष्य आये हुए हैं । नरेन्द्र से उनकी क्या बातचीत हो रही है, चलिये सुनें ।
(क्रमशः)

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