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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~११७/१२०*
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*माया पानी पुहमि१ घट, निकसे सकल मँझार ।*
*रज्जब रहै सुकुंभ में, घड्या सु गुरु के बार ॥११७॥*
जैसे पृथ्वी१ की मिट्टी तो कैसी भी हो जल निकल जाता है किन्तु कुंभकार के द्वारा तैयार किये हुये घड़े से नहीं निकलता । वैसे ही माया सभी के ह्वदय को छेद डालती है किन्तु गुरु के द्वार पर ज्ञानोपदेश द्वारा तैयार हुये अन्त:करण को नहीं छेद सकती अर्थात उसमे किसी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं कर सकती ।
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*सद्गुरु साधु सवित्त१ तहँ, वैरागर२ की खानि ।*
*रज्जब खोद विवेक सौं, तहाँ नहीं कछु हानि ॥११८॥*
सद्गुरु और संत भक्ति वैराज्ञादि रूप धन१ से युक्त हैं, उन्हीं में ज्ञान रूप हीरों२ की खानि है, हे साधक ! तू विवेक पूर्वक उनसे प्रश्न पूछनादिरूप खोदने की क्रिया कर तो तुझे लाभ ही होगा, वहां पर हानि तो कुछ नहीं होती ।
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*सद्गुरु पारस पौरसा१, अक्षय अभय भण्डार ।*
*रज्जब बचन विवेक धन, लहिये बारम्बार ॥ ११९॥*
सद्गुरु पारस और पूजा करके काटने से हाथ-पैरों का सुवर्ण प्रति दिन देने वाली स्वर्ण निर्मित मनुष्याकार मूर्ति१ के समान है, निर्भय करने वाले ज्ञान-धन के अक्षय भण्डार हैं । अत: विवेकपूर्वक उसके वचनों से ज्ञान-धन बारम्बार लेना चाहिये ।
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*ज्यो बहु रत्न समुद्र में, त्यों सद्गुरु शब्द धनाढि ।*
*मरजीवा ह्वै मांहि मिल, जन रज्जब वित१ काढि ॥१२०॥*
जैसे समुद्र में बहुत रत्न हैं, वैसे ही सद्गुरु भी भक्ति, वैराग्य, ज्ञानादि युक्त शब्द धन के धनाढ़य हैं किन्तु जो मरजीवा समुद्र में गोता लगाता है, उसे ही रत्न मिलते हैं । वैसे ही सद्गुरु के शब्दों में मन लगाता है वही ज्ञानादिक धन१ निकाल सकता है ।
(क्रमशः)

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