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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*हम चाहैं सो ना मिलै, और बहुतेरा आइ ।*
*दादू मन मानै नहीं, केता आवै जाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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राखाल से नरेन्द्र ने प्रसन्न की बात कही । प्रसन्न ने नरेन्द्र को एक पत्र लिखा है, वह पत्र पढ़ा जा रहा है । पत्र इस आशय का है - "मैं पैदल ही वृन्दावन चला । मेरे लिए यहाँ रहना अच्छा नहीं है । यहाँ भाव का परिवर्तन हो रहा है । पहले तो मैं माता-पिता और घर के दूसरे मनुष्यों का स्वप्न देखा करता था, इसके पश्चात् मैंने माया की मूर्ति देखी । दो बार मुझे बड़ा कष्ट मिला, घर लौट जाना पड़ा था । इसीलिए अब की बार दूर जा रहा हूँ ।
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श्रीरामकृष्णदेव ने मुझसे कहा था 'तेरे वे घरवाले सब कुछ कर सकते हैं, उनका विश्वास न करना ।' "
राखाल कह रहे हैं, "वह इन्हीं अनेक कारणों से चला गया है । और उसने यह भी कहा है, 'नरेन्द्र अपनी माँ और भाइयों की खबर लेने और मुकदमा आदि करने के लिए घर चला जाया करता है । मुझे भय है कि उसकी देखा-देखी कहीं मुझे भी घर जाने की इच्छा न हो ।' "
यह सुनकर नरेन्द्र चुप हो रहे ।
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राखाल तीर्थ जाने की बातचीत कर रहे हैं । कह रहे हैं, 'यहाँ रहकर तो कहीं कुछ न हुआ । उन्होंने (श्रीरामकृष्ण ने) जो कहा है - ईश्वरदर्शन, वह कहाँ हुआ ?' राखाल लेटे हुए हैं । पास ही भक्तों में कोई लेटे हुए हैं, कोई बैठे ।
राखाल - चलो, नर्मदा की ओर निकल चलें ।
नरेन्द्र - निकलकर क्या होगा ? ज्ञान इससे थोड़े ही होता है, जिसके सम्बन्ध में तूने इतनी रट लगा दी है ।
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एक भक्त - तो फिर संसार का त्याग तुमने क्यों किया ?
नरेन्द्र - राम को नहीं पाया, इसलिए क्या श्याम के साथ रहना चाहिए ? ईश्वर-लाभ नहीं हुआ, इसलिए क्या बच्चे पैदा करते रहना चाहिए ? यह कैसी बात है ?
यह कहकर नरेन्द्र जरा उठ गये । राखाल लेटे हुए हैं ।
कुछ देर बाद नरेन्द्र फिर लौटे और आसन ग्रहण किया ।
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मठ के एक भाई लेटे ही लेटे हास्य में कह रहे हैं मानो ईश्वर-दर्शन के बिना उन्हें बड़ा कष्ट हो रहा हो - "अरे, कोई है ? - मुझे एक छुरी तो दो, प्राणान्त कर लूँ – बस अब तो कष्ट सहा नहीं जाता !"
नरेन्द्र - (मानो गम्भीर होकर) - वहीं है, हाथ बढ़ाकर उठा लो (सब हँसते है)
फिर प्रसन्न की बात होने लगी ।
नरेन्द्र - यहाँ भी माया ! फिर हम लोगों ने संन्यास क्यों लिया ?
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राखाल - 'मुक्ति और उसकी साधना' नामक पुस्तक में है कि संन्यासियों को एक जगह नहीं रहना चाहिए । 'संन्यासीनगर' की कथा उसमें है ।
शशी - मैं संन्यास-फन्यास नहीं मानता । मेरे लिए ऐसा कोई स्थान नहीं है, जो अगम्य हो । ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ मैं न रह सकूँ ।
भवनाथ की बात चलने लगी । भवनाथ की स्त्री को कठिन पीड़ा हुई थी ।
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नरेन्द्र - (राखाल से) - जान पड़ता है, भवनाथ की बीबी बच गयी; इसीलिए मारे खुशी के दक्षिणेश्वर घूमने गया था ।
काँकुड़गाछी के बगीचे की बातचीत होने लगी । रामबाबू वहाँ मन्दिर बनवाने का विचार कर रहे हैं ।
नरेन्द्र - (राखाल से) - रामबाबू ने मास्टर महाशय को एक 'ट्रस्टी'(trustee) बनाया है ।
मास्टर - (राखाल से) - परन्तु मुझे तो इसकी कोई खबर नहीं ।
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शाम हो गयी । शशी श्रीरामकृष्ण के कमरे में धूप देने लगे । दूसरे कमरों में श्रीरामकृष्ण के जितने चित्र थे, वहाँ भी धूप-धूना दिया गया । फिर मधुर कण्ठ से उनका नामोच्चारण करते हुए उन्हें प्रणाम किया ।
अब आरती हो रही है । मठ के गुरु-भाई और दूसरे भक्त हाथ जोड़कर खड़े हुए आरती देख रहे हैं । झाँझ और घण्टे बज रहे हैं । भक्तवृन्द एकस्वर से आरती गा रहे हैं –
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"जय शिव ओंकार, भज शिव ओंकार ।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, हर हर हर महादेव ।"
नरेन्द्र पहले गाते हैं, पीछे से उनके दूसरे गुरु-भाई । यही गायन श्रीकाशीधाम में विश्वेश्वर-मन्दिर में हुआ करता है ।
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भोजन आदि समाप्त करते हुए रात के ग्यारह बज गये । भक्तों ने मास्टर के लिए एक बिछौना बिछा दिया और वे स्वयं भी सो गये ।
आधी रात का समय है । मास्टर की आँख नहीं लगी । वे सोच रहे हैं । - 'सब तो है, - अयोध्या तो वही है, परन्तु बस राम नहीं हैं ।' मास्टर चुपचाप उठ गये । आज वैशाख की पूर्णिमा है । मास्टर अकेले गंगाजी के तट पर टहल रहे हैं । श्रीरामकृष्ण की बातें सोच रहे हैं ।
(क्रमशः)

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