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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१७. बचन बिबेक को अंग २३/२५*
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जा बांणी मैं पाइये, भक्ति ज्ञान बैराग ।
सुन्दर ताकौं आदरै, और सकल कौ त्याग ॥२३॥
भक्त जनों को वह वाणी ही बोलनी चाहिये जिसमें भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य के भाव मिश्रित हों । भक्त को उसमें आदर दिखाते हुए अन्य सब लौकिक वाणियों की उपेक्षा(त्याग) ही करनी चाहिये ॥२३॥
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जा बानी हरि गुन बिना, सा सुनिये नहिं कांन ।
सुन्दर जीव न देखिये, कहिये मृतक समान ॥२४॥
जो वाणी प्रभु के गुणगान से रहित हो, उस को कान पर भी नहीं रखना चाहिये; क्योंकि उस वाणी में कोई जीवनप्रवाह नहीं होता । वह मृतक के समान निःसार एवं निरर्थक है ॥२४॥
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रचना करी अनेक विधि, भलौ बनायौ धाम ।
सुन्दर मूरति बाहरी, देवल कौंनैं काम ॥२५॥
इति बचन बिबेक को अंग ॥१७॥
क्योंकि श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि कोई पुरुष बहुत श्रद्धा भाव के साथ कोई दिव्य कलापूर्ण मन्दिर बनावे; परन्तु उसमें किसी देवमूर्ति की स्थापना न हो तो ऐसा मन्दिर भक्तसमाज में निरर्थक ही माना जाता है ॥२५॥
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इति वचन विवेक का अङ्ग सम्पन्न ॥१७॥
(क्रमशः)

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