रविवार, 1 फ़रवरी 2026

*श्रीरामकृष्ण का प्रेम तथा राखाल*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*श्रीरामकृष्ण का प्रेम तथा राखाल*
राखाल काली तपस्वी के कमरे में बैठे हुए हैं । पास ही प्रसन्न है । उसी कमरे में मास्टर भी हैं ।
राखाल अपनी स्त्री और लड़के को छोड़कर आये हैं । उनके हृदय में वैराग्य की गति तीव्र हो रही है । उन्हें एक यही इच्छा है कि अकेले नर्मदा के तट पर या कहीं अन्यत्र चले जायें । फिर भी वे प्रसन्न को बाहर भागने से समझा रहे हैं ।
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राखाल - (प्रसन्न से) - कहाँ तू बाहर भागता फिरता है ? यहाँ साधुओं का संग –
क्या इसे छोड़कर कहीं जाना होता है ? - तिसपर नरेन्द्र जैसे व्यक्ति का साथ छोड़कर ? यह सब छोड़कर तू कहाँ जायगा !
प्रसन्न - कलकत्ते में माँ-बाप हैं । मुझे भय होता है कि कहीं उनका स्नेह मुझे खींच न ले । इसीलिए कहीं दूर भाग जाना चाहता हूँ ।
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राखाल - श्रीगुरु महाराज जितना प्यार करते थे, क्या माँ-बाप उतना प्यार कर सकते हैं ? हम लोगों ने उनके लिए क्या किया है, जो वे हमें उतना चाहते थे ? क्यों वे हमारे शरीर, मन और आत्मा के कल्याण के लिए इतने तत्पर रहा करते थे ? हम लोगों ने उनके लिए क्या किया है ?
मास्टर - (स्वगत) अहा ! राखाल ठीक ही तो कह रहे हैं, इसीलिए उन्हें (श्रीरामकृष्ण को) अहेतुक कृपासिन्धु कहते हैं ।
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प्रसन्न - क्या बाहर चले जाने के लिए तुम्हारी इच्छा नहीं होती ?
राखाल - जी तो चाहता है कि नर्मदा के तट पर जाकर रहूँ । कभी कभी सोचता हूँ कि वहीं किसी बगीचे में जाकर रहूँ और कुछ साधना करूँ । कभी यह तरंग उठती है कि तीन दिन के लिए पंचतप करूँ; परन्तु संसारी मनुष्यों के बगीचे में जाने से हृदय इनकार भी करता है ।
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क्या ईश्वर हैं ?
'दानवों के कमरे' में तारक और प्रसन्न दोनों वार्तालाप कर रहे हैं । तारक की माँ नहीं है । उनके पिता ने राखाल के पिता की तरह दूसरा विवाह कर लिया है । तारक ने भी विवाह किया था, परन्तु पत्नी-वियोग हो गया है । मठ ही तारक का घर हो रहा है । प्रसन्न को वे भी समझा रहे हैं ।
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प्रसन्न - न तो ज्ञान ही हुआ और न प्रेम ही, बताओ क्या लेकर रहा जाय ?
तारक - ज्ञान होना अवश्य कठिन है परन्तु यह कैसे कहते हो कि प्रेम नहीं हुआ ?
प्रसन्न - रोना तो आया ही नहीं, फिर कैसे कहूँ कि प्रेम हुआ ? और इतने दिनों में हुआ भी क्या ?
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तारक - क्यों ? तुमने श्रीरामकृष्णदेव को देखा है या नहीं ? फिर यह क्यों कहें कि तुम्हें ज्ञान नहीं हुआ ?
प्रसन्न - क्या खाक होगा ज्ञान ? ज्ञान का अर्थ है जानना । क्या जाना ? ईश्वर है या नहीं इसी का पता नहीं चलता –
तारक - हाँ, ठीक है, ज्ञानियों के मत से ईश्वर है ही नहीं ।
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मास्टर - (स्वगत) – अहा ! प्रसन्न की कैसी अवस्था है ! श्रीरामकृष्ण कहते थे, "जो लोग ईश्वर को चाहते हैं, उनकी ऐसी अवस्था हुआ करती है । कभी कभी ईश्वर के अस्तित्व में सन्देह होता है ।' जान पड़ता है, तारक इस समय बौद्ध मत का विवेचन कर रहे हैं, इसीलिए शायद उन्होंने कहा - 'ज्ञानियों के मत से ईश्वर है ही नहीं ।' परन्तु श्रीरामकृष्ण कहते थे - 'ज्ञानी और भक्त, दोनों एक ही जगह पहुँचेंगे ।'
(क्रमशः)

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