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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१८. सूरातन कौ अंग १७/१९*
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सुन्दर सोई सूरमा, लोट पोट ह्वै जाइ ।
बोट कछू राखै नहीं, चोट मुहें मुंह खाइ ॥१७॥
श्रीसुन्दरदासजी उसी पुरुष को सच्चा शूर वीर मानते हैं जो युद्ध करते हुए युद्ध - भूमि में ही गिर कर भी, बिना किसी आवरण के शत्रु पर आक्रमण करता रहे या अपने शरीर पर शत्रु का आक्रमण सहता रहे ॥१७॥
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सुन्दर सूरातन करै, छाडै तन को मोह ।
हबकि थबकि पेलै पिसण, जाइ चखाँवै लोह ॥१८॥
श्रीसुन्दरदासजी की दृष्टि में वही सच्चा वीर है जो अपने शरीर का मोह छोड़ कर आगे बढ़ बढ़ कर तीव्रता के साथ, वीरता का प्रदर्शन कर, शत्रुओं को शस्त्रों से मारता काटता रहे ॥१८॥
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सुन्दर फेरै सांगि जब, होइ जाइ बिकराल ।
सनमुख बांहै ताकि करि, मारै मीर मुछाल ॥१९॥
ऐसा वीर युद्ध में जब अपने वास्तविक रूप में आता है तो वह देखने में भयानक लगने लगता है । उस समय वह अपने सामने किसी भी मूंछों वाले (बलवान्) योद्धा को भी नगण्य समझता हुआ मार ही डालता है ॥१९॥
(क्रमशः)

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