गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~१/४*


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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~१/४*
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गुरुदेव के अंग के अनन्तर अयोग्य गुरु और अयोग्य शिष्यों का परिचय देने के लिये गुरु-शिष्य निर्गुण का अंग कह रहे हैं -
*गुरु शिष भूखे मिले अभागी, दीक्षा नहिं मानहु दौ१ लागी ।*
*संतोष नीर नाहीं सो नीरा२, तृष्णा अग्नि बुझावे बीरा३ ॥१॥*
गुरु प्रतिष्ठा का भूखा और शिष्य विषयों का भूखा दोनों भाग्यहीन मिल जाते हैं तब गुरु द्वारा शिष्य को जो दीक्षा मिलती है सो दीक्षा न होकर मानो दावाग्नि१ लगा है, ऐसा ज्ञात होता है । जैसे समीप जल२ न हो तो वन३ का अग्नि नहीं बुझता वैसे ही इनके मन के समीप संतोष न होने से इनकी उक्त तृष्णा नष्ट नहीं होती, सदा तृष्णा से जलते ही रहते हैं ।
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*भूखे गुरु शिष यूं मिलैं, ज्यों वैशाखे बँस डार ।*
*जन रज्जब बोलत घसत, दोऊ जर बर छार ॥२॥*
तृष्णा रूप भूख से युक्त गुरु शिष्यों का मिलन वैशाख मास में बाँस की डालों के घिसने के समान होता है । बैशाख में बाँस की डालें वायु के वेग से घिसती हैं तब अग्नि प्रगट होकर बाँस जल जाते हैं, वैसे ही गुरु शिष्य अपनी आपस की बोल-चाल द्वारा क्रोधाग्नि प्रगट होने से जल जल कर मरते हैं ।
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*चेला चकमक गुरु गति गार१, गोष्टी४ ठणका२ अग्नि अपार ।*
*मिलत महातम३ जलन सुहोय, ऐसे दैई५ न मेली दोय ॥३॥*
चकमक का आघात२ पत्थर१ पर लगता है तब किंचित अग्नि निकल कर बहुत हो जाता है, सूत्र, पट, काष्ठादि को जलाता है । यह चकमक और पत्थर के मिलन का ही महात्म्य३ है । वैसे ही शिष्य और गुरु की बातों४ से क्रोधाग्नि चमक आता है और दोनों के हृदयों को जलाता है, यही उनसे मिलन का माहात्म्य है । ईश्वर५ ऐसे गुरु-शिष्य न मिलावे ।
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*सद्गुरु सीझ्या पोरसा, शिष शाखों शिर भाग ।*
*रज्जब पूरे पीर बिन, ठाहर उभय अभाग ॥४॥*
सद्गुरु पने को सिध्द पौरषा(सिद्धि युक्त सुवर्ण के पुतले) के समान बताते हुये शिष्य-प्रशिष्यादि शाखाओं का भार शिर पर खड़ा करता है और कहता है - तुम्हारे अच्छे भाग्य थे तभी तो मेरे शिष्य हो सके हो, भाग्य बिना हमारे समान गुरु कहाँ मिलते हैं । शिष्य भी उन कपटी गुरुओं की कपटपूर्ण बातों से उन पर मुग्ध होते हुये तथा गुरु की प्रशंसा के पुल बाँधते हुये संसार के सरल प्राणी को धोखा देते हैं जब तक पूर्ण-अवस्था को प्राप्त सिद्ध गुरु प्राप्त नहीं होते तब तक उक्त प्रकार के गुरु और शिष्य दोनों ही के हृदय स्थान में उक्त प्रकार का दंभ रहता है और यह उनके भाग्यहीनता का चिन्ह है ।
(क्रमशः) 

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