🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू नाम निमित रामहि भजै,*
*भक्ति निमित भजि सोइ ।*
*सेवा निमित सांई भजै, सदा सजीवन होइ ॥*
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नाम स्मरण ॥
मन मति बीसरै रे, राम नाम सुमिरि बारंबार ।
संसार सागर भजन भेरी, लंघि पैली पार ॥टेक॥
साध बोलै साखि सुणि रे, सब्द कीजै कानि ।
थोघी देखी थाह नाहीं, डूबसे निरवानि ॥
चित चितारि एक सोई, और कोई नाहिं ।
राज संपति विभौ माया, सर्व मेल्ह्या जाहिं ॥
जिहि कारणैं मति मरै मूरिख, जतन करताँ जाइ ।
बिचारि बषनां बिनसि जासी, अरथि ऐकै लाइ ॥४८॥
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हे मन ! राम-नाम का विस्मरण मत कर । इसका स्मरण बारंबार तैलधारावत् अहर्निश कर । संसार रूपी सागर को दूसरे किनारे तक पार करने के लिये यह भजन ही नाव है । साधु-सद्गुरु द्वारा दिये जाने वाले अपरोक्षज्ञान समन्वित उपदेश को सुन और उसको कानों में से निकाल मत । कानों में ही सुरक्षित करले जिससे कि वह उपदेश तुझे सतत् सावधान करता रहे । इस संसार रूपी सागर की गहराई को थोघि = सीमा देखने के साधन रस्सी, लठ्ठी आदि से देख ।
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वस्तुतः यह अथाह-निस्सीम है, बिना भगवद्भजन के इसमें निश्चय ही तू डूब जायेगा । चित्त में चिंतन-मनन कर । संसार में एक परमात्मा ही अपना है, वही प्रापणीय है और कोई दूसरा नहीं । उस परमात्मा से व्यतिरिक्त राज, सम्पत्ति, वैभव, धन आदि यहीं रह जाने वाले हैं; इनमें से एक भी साथ चलने वाला नहीं है ।
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हे मूर्ख ! ऐसा यत्न करता हुआ चल जिसके करने से तेरा पुनः मरना न हो सके । तू अमर हो जाये । बषनां कहता है, विचार कर, जिनको प्राप्त करने में तू प्रपंच रत है वे सभी समय पाकर समाप्त हो जायेंगे । अतः तू अपनी चित्तवृत्ति को एक परमात्मा में ही लगाकर चिंतन-मनन कर ॥४८॥
(क्रमशः)
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