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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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* ५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~१/४*
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गुरु-शिष्य निर्णय-अंग के अनन्तर गुरु-शिष्यपने में हेतु निर्णय का बिचार करने के लिये गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग कह रहे हैं -
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*सतगुरु सोध रू कीजिये, साहिब सौं सांचा ।*
*रज्जब परसे पार ह्वै, सुन मनसा वाचा ॥१॥*
जो ईश्वर की आज्ञानुसार रह कर ईश्वर के आगे सच्चा रहता हो, ऐसी परीक्षा करके गुरु बनाना चाहिये, ऐसे गुरु का उपदेश श्रवण करके मन-वचन द्वारा उसके अनुसार व्यवहार करता है वह संसार से पार होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है ।
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*सद्गुरु सोध रू कीजिये, साहिब सौ पूरा ।*
*रज्जब रहता राखिले, गुरु जीवन मूरा ॥२॥*
ईश्वर की आज्ञा मानने में जो ईश्वर के आगे पूरा हो ऐसी जाँच करके ही गुरु बनाना चाहिये । जो गुण विकारों से रहित होता है वही गुरु संसार प्रवाह में बहते हुये प्राणी को जीवन के मूल परब्रह्म में स्थिर रख सकता है ।
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*सत जत सुमिरण हिरदै साँच, सो सद्गुरु शिष ह्वै मन राच ।*
*रज्जब कहै परख गुरुदेव, सेवक हो कीजे ता सेव ॥३॥*
जो सत्य, संयम, ईश्वर स्मरणादि साधनों में हृदय से सच्चा हो वही सद्गुरु है, उसी का शिष्य होकर उसी में मन से प्रेम करो । हम तो यही कहते हैं कि - प्रथम परीक्षा करके ही गुरु बनाओ और सच्चे सद्गुरु के सेवक बन कर सेवा करो ।
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*सद्गुरु मृतक१ जहाज गति, शिष सब जीवित माँहिं ।*
*जन रज्जब जोख्यूँ२ गई, भव जल बूडैं नाँहिं ॥४॥*
४-६ में सच्चे सद्गुरु के शरण में हानि नहीं होती यह कहते हैं - सद्गुरु शुष्क काष्ठ१ से बने हुये जहाज के समान है और शिष्य उसमें बैठने वाले जीवित प्राणियों के समान हैं, जैसे जहाज में बैठने वाले जल में नहीं डूबते उनके डूबने का भय चला जाता है । वैसे ही जीवनमुक्त२ सद्गुरु की शरण में जाने से संसार दशा रूप जीवन वाले प्राणियों का संसार भय चला जाता है, वे संसार-सागर में नहीं डूबते ।
(क्रमशः)

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