मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

*भक्ति माहात्म्य ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार ।*
*कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥*
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*भक्ति माहात्म्य ॥*
न्यारी रे न्यारी रे गोबिंदा की भगती, न्यारी रे ।
काँही काँही निर्मलै हिरदै धारी रे ॥टेक॥
माँहे मैलौ मंनि कालौ, ऊपराँ पाणी पखालै ।
सुचि असी हसती न्हबालै, तिती पाछै धूल रालै ॥
बिषै गावै बिषै सुनावै, बिषै की देसि दिखावै ।
बेद नैं साखी बुलावै, क्याँहनैं पिरथी भरमावै ॥
बकता जो बाकि सुणाई, सुरता कै हिरदै आई ।
तामैं जाण न दीन्हीं काई, मन मैं राखी सवाई ॥
आंधा की बाँह आँधै झाली, तिहि कै सँगि सब दुनिया चाली ।
ले डबोई बिषै माँहीं, नीसरतौ को दीसै नाँहीं ॥
तीनि गुण थैं निर्मल न्यारी, सो परमेस्वर नैं भगति पियारी ।
बषनां साधाँ विचारी, बेदो गति गीता पुकारी ॥५३॥ 
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गोविन्द की अनन्य, अहैतुकी भक्ति उस भक्ति से सर्वथा विलक्षण = न्यारी है, जिसको जगत् के भ्रमित लोग करते हैं । कोई-कोई निर्मल चित्त वाले भक्त ही इस विलक्षण भक्ति को धारण करते हैं । भ्रमित लोग जिस प्रकार की भक्ति करते हैं, उसका विवरण देते हुए कहते हैं, ऊपर से शरीर को जल से स्नान कराकर उज्जवल = मल रहित करते हैं किन्तु अंदर में, मन में काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य, दुराचार भरे होने से मैला = मल सहित ही रहते हैं । 
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इनकी पवित्रता ठीक वैसी ही है जैसी हाथी की, जो खूब मल-मल कर नहलाने के उपरांत भी अपनी सूंड से अपने ऊपर मिट्टी डाल लेता है । ये लोग विषय = श्रृंगार रस का ही गायन करते हैं और उसी को दूसरों को गा गाकर सुनाते हैं तथा विषयों की ओर दृष्टि जाये, ऐसा ही मार्ग बताते हैं । अपनी बातों की पुष्टि में साक्षी के रूप में वेदों का उद्धरण देते हैं और विषयभोगों के लिये पूरी पृथिवी पर भ्रमते-फिरते हैं । 
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ऐसे भ्रमित वक्ता जिस विषय का कथन करते हैं, विषयी श्रोता उसी को यथातथ्य मानकर अपने हृदय में धारण कर लेते हैं । विषयी श्रोता उन कामुक और विषयभोगों से युक्त बातों को मन में सवागुनी संचित करके रखते हैं; उनमें से त्यागते तो एक बात को भी नहीं हैं । वस्तुतः इन लोगों की स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसी किसी अंधे ने अंधे की बाँह पकड़ ली हो और मार्ग दिखाने का उपक्रम कर रहा हो । 
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यथार्थ में इन अविवेकी उपदेशकों-मार्गदर्शकों के मार्गदर्शन में ही सारी दुनिया चल रही है । इन्होंने सारी दुनिया को विषय भोगों में डुबो दिया है । उनमें से कोई उन विषय भोगों रूपी समुद्र में से निकलता हुआ नहीं दिखाई देता । परमेश्वर को वह भक्ति प्रिय है जो तीनों गुणों से असम्पृक्त हुए निर्मल मन से की जाये । बषनां कहता है, साधु-संतों ने उसी भक्ति को अंगीकार किया है जिसका कथन वेदों में, गीता में किया गया है ॥५३॥    
(क्रमशः)

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