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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ५७/६०*
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सुन्दर कोऊ साधु की, निंदा करै लगार ।
जन्म जन्म दुख पाइ है, ता महिं फेर न सार ॥५७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि कोई दुष्ट आदमी 'सन्त' की निरन्तर निन्दा करता है तो वह उसके फलस्वरूप अनेक जन्मों तक दुःख पाता रहेगा । मेरी इस बात में तुम कुछ भी मिथ्या न समझना ॥५७॥
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सुन्दर कोऊ साधु की, निंदा करै कपूत ।
ताकौं ठौर कहूं नहीं, भ्रमत फिरै ज्यौं भूत ॥५८॥
यदि कोई कुपुत्र(कपूत) साधु की निन्दा करता है तो समझ लो कि ऐसे निकृष्ट आदमी को, खोजने पर भी, कोई शरणस्थल नहीं मिलेगा । वह इस संसार में, मरणपर्यन्त, भूत के समान इधर से उधर चक्कर लगाता ही रह जायगा ॥५८॥
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संतनि की निंदा कियें, भलौ होइ नहिं मूलि ।
सुन्दर बार लगै नहीं, तुरत परै मुख धूलि ॥५९॥
सन्तों की निन्दा करने वाले का कभी कुछ भी भला नहीं हो सकता । ऐसे सन्तों के निन्दक की समाज में अप्रतिष्ठा होने में कोई विलम्ब नहीं लगता । जिस के कारण उस को अन्त में लज्जित ही होना पड़ता है ॥५९॥
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संतनि की निंदा करै, ताकौ बुरौ हवाल ।
सुन्दर उहै मलेछ है, उहै बडौ चण्डाल ॥६०॥
इति साधु की अंग ॥१९॥
समाज में जो सन्तों की निन्दा करेगा, अन्त में उस की दुर्दशा ही होगी । समाज या तो उसे म्लेच्छ(= अनार्य = अनाड़ी) कहेगा या निकृष्ट(गया गुजरा) चाण्डाल(हीन समाज या वर्ग में जन्मा) कहेगा । अतः सन्त की निन्दा कभी नहीं करना चाहिये ॥६०॥
इति साधु का अंग सम्पन्न ॥१९॥
(क्रमशः)

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