रविवार, 22 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २९/३२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ २९/३२*
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*तन मन शिष रोगी भये, वैद्य मिले गुरु आय ।*
*जन रज्जब सु हाकीम हद, जासौं व्यथा विलाय ॥२९॥*
शरीर रोगी होने पर अनेक वैद्य मिलते हैं किन्तु सबसे अच्छा चिकित्सक वही माना जाता है, जिससे रोग दूर हो जाय । वैसे ही शिष्य का मन भव रोग से व्यथित है, उसे भी अनेक गुरु मिलते हैं, किन्तु जो जन्मादि दु:ख को दूर करे वही सबसे अच्छा गुरु माना जाता है ।
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*रोगी वैद्य पिछान ले, बूंटी सत्य सुजान ।*
*व्यथा विलय ह्वै परसतै, रज्जब सो सु प्रमान१ ॥३०॥*
जो रोगी के रोग कौ और उसकी औषधि को यथार्थ रूप से पहचान लेता है, वही बुद्धिमान सच्चा वैद्य है, उसकी चिकित्सा से रोग दूर हो जाता है, वैसे ही जो साधक के विकारों को और उनके दूर करने के साधनों को पहचान लेता है, वही माननीय१ गुरु है उस श्रेष्ठ गुरु के उपदेश से भव रोग नष्ट हो जाता है ।
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*तृण१ तोयं२ रस तन हुँ मिल, तनै३ तनइया४ होत ।*
*रज्जब जंगम५ जगमगे, स्थावर६ गल गये गोत ॥३१॥*
३१-३२ में गुरु की विशेषता बता रहे हैं - घास१ और जल२ शरीर में जाकर मिलते हैं तब जठराग्नि से पच कर रस बनता है, रस से रज - वीर्य बनकर शरीर३ से पुत्र४ होता है । देखो, अचल६ घास और जल, चल५ शरीर के संग से पुत्र रूप से शोभित होता है और स्थावर गोत्र नष्ट हो जाता है, वैसे ही मूर्ख प्राणी गुरु के संग से ज्ञानी रूप से शोभित होता है और मूर्खपना नष्ट हो जाता है ।
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*विविध भाँति बूटी वन हुँ, वेत्ता१ ल्याव हिं जौय२ ।*
*रज्जब रोग तिन हुं हटे, पै वैद्य वन्दना होय ॥३२॥*
वन में नाना प्रकार की औषधियां होती है, उनको जानने वाले१ देख२ कर लाते हैं । रोग उन औषधियों से ही हटते हैं, परन्तु रोग निवृत्ति पर पूजा चिकित्सा करने वाले वैद्य की ही होती है, वैसे ही वेदादि ग्रंथों में नाना प्रकार के विचार हैं, उनको समझने वाले विद्वान उन्हें संग्रह करते हैं, अज्ञान भी उन विचारों से ही नष्ट होता है, परन्तु अज्ञान नष्ट होने पर पूजा उपदेशक गुरु की ही होती है ।
(क्रमशः)

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