🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ ।*
*दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥*
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भ्रमविध्वंश ॥साषी॥१ (१ लौकिक माया कौ अंग” में साषी क्रमांक ३ में इसका अर्थ देखें ।)
बेद बिड़ौ बषनां हम जाण्या, रस सिंगार दह डार्या ।
थोह कै दूध माछला माता, ज्याँह पिया तैं मार्या ॥
पद ॥
अैसा बैद बेद कलि मांहीं । ताथैं रोगी जीवै नांहीं ॥टेक॥
हरि गोपी काँधै करि लीन्हीं, अैसा ग्यान दिढ़ावै ।
जैसी सुणैं ऊपजै तैसी, लहरि बिषै की आवै ॥
काम कलपना बिषै बुराई, यहु बेदन घट मांहीं ।
बैद मिल्या परि पीड़ न भागी, ठौर नाटिका नांहीं ॥
करम बिथा काटण कै कारणि, सुनते थे सब लोई ।
औषद और पीड़ कछु औरे, ताथैं कुपछि पड्या सब कोई ॥
बीस बरस का पुरिष सुणैं था, सोलह ब्रस की नारि ।
बषनौं कहै भली समझाई, भूलै चोटि कटारी ॥५८॥
हरि = निर्गुण-निराकार परमात्मा, सगुण-साकार-भगवान् बनकर गोपियों के कंधों पर हाथ रखकर रास रचाया करता था, इस प्रकार का ज्ञानोपदेश कलियुग के वैद्य रूपी उपदेशक, गुरु श्रोताओं को यह कहकर करते हैं कि वेदों में, पुराणों में ऐसा ही लिखा है ।
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इस मिथ्या अथवा विषय-वासना-जागृत करने वाली ज्ञान रूपी औषधि से रोगी रूपी श्रोता कभी भी जीवै = जीवन्मुक्त नहीं होता उल्टे बार-बार जन्मता और मरता रहता है । क्योंकि व्यक्ति जैसे विचार सुनता है, वैसे ही संस्कार उसके चित्त में निर्मित होते हैं और जैसे संस्कार निर्मित होते हैं, व्यक्ति वैसा ही करता है । विषयों की बातें सुनने से विषयों को भोगने की लहरि = इच्छा जागृत होती है । काम की कल्पना = चिंतन और विषयों का भोग ही शरीर में बेदन = व्याधि = बीमारी हैं ।
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इन बीमारियों को दूर करने वाले गुरुओं की प्राप्ति तो हो जाती है किन्तु पीड़ा = बीमारियों का अंत नहीं होता क्योंकि इन गुरुओं का न तो बीमारी समाप्त करने का दृष्टिकोण ही होता है और न इनमें इनको समाप्त करने की सामर्थ्य ही होती है । कर्मों रूपी व्यथा = बीमारियों को समाप्त करने के लिये ही श्रोता रूपी बीमार इन गुरुओं के उपदेश सुनते हैं किन्तु इनकी बीमारी तो कुछ अलग प्रकार की है जबकि इन गुरुओं के उपदेश अलग प्रकार के हैं ।
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श्रोताओं की बिमारी विषयभोगों में आसक्ति है । वे इससे छुटकारा पाना चाहते हैं जबकि गुरु उपदेशक उपदेश ही इसप्रकार का करते हैं जिससे विषयभोगों में आसक्ति घटने के बजाय उल्टे बढ़ती ही है । फलस्वरूप सभी लोग कुपछि = कुपथ्य = कुमार्ग पर ही आरुढ़ हो गये हैं । कोई भी निर्गुण-निराकार की भक्ति = नामस्मरण की ओर उन्मुख नहीं हो पाते हैं ?
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वस्तुतः उपदेश सुनने वाले पुरुष बीस वर्ष और स्त्री सोलह वर्ष की उम्र वाले होते हैं अर्थात् दोनों ही नवयुवक होते हैं जिनमें स्वाभाविक रूप से ही काम का वेग अत्यन्त प्रबल होता है । फिर इनको श्रृंगारिक बातें उक्त गुरुओं, उपदेशकों से सुनने को मिल जाती हैं जिससे इनमें काम वासना और अधिक वेग से उद्दीप्त हो जाती है ।
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बषनांजी कटाक्ष करते हुए कहते हैं, इन गुरुओं ने क्या ही भली बात इनको समझाई है कि ये इन विषय भोगों में इस प्रकार आकंठ डूब जाते हैं कि ये यमराज की कटारी = मुदगर की कठोर मार को भी भूल जाते हैं ॥५८॥
(क्रमशः)

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