मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ३७/४०*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*५. गुरु-शिष्य निदान निर्णय का अंग ~ ३७/४०*
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*कूवे बाय१ तलाब के, धणियों२ कछू न होय ।*
*जन रज्जब जल जाँहिं सूर में, त्यों सद्गुरु सब कोय ॥३७॥*
कूप, बावली१, तालाबादि जलाशयों के जल को सूर्य खेंच लेते हैं, जलाशयों के स्वामियों२ से कुछ भी रोक-थाम नहीं होती । वैसे ही सभी भेषधारियों के शिष्यों को सद्गुरु उनके परब्रह्म की ओर खेंच लेते हैं ।
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*गुरु गाफिल देखत रहैं, सद्गुरु शिष ले जाय ।*
*रज्जब पहुँचे गीध ज्यों, अति चलते के पाय ॥३८॥*
साधारण गुरु तो सकाम कर्मों का उपदेश देने से परमार्थ में असावधान रहते हैं, और आशापूर्ति के लिये शिष्यों की ओर देखते ही रहते हैं, शिष्यों का उद्धार नहीं कर सकते, इससे शिष्य संसार से पार नहीं हो सकते किन्तु सद्गुरु तो गिद्ध के समान ज्ञान रूप दूर दृष्टि वाले होने से परब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं ओर शिष्यों को भी निष्काम कर्म का उपदेश देना रूप अति शीध्र चलने वाले पैर देकर ज्ञान मार्ग द्वारा ब्रह्म के पास पहुँचा देते हैं ।
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*मन कपूर नाहीं रहै, चित्र चीर के बंधि ।*
*सद्गुरु लेहि समीर ज्यों, गठि बँध पडे न संधि ॥३९॥*
जैसे कपूर को कपडे की गाँठ में बँधे रहने पर भी वायु उडा ले जाता है कपडे की गाँठ में कोई संधि नहीं होती । वैसे ही विचित्र संसार में बँधे हुये मन को गुरु निकाल कर परमात्मा की ओर ले जाते हैं और संसार ज्यों का त्यों रहता है ।
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*विविध बास बहु बंदगी, चले पवन सँग पीर१ ।*
*रज्जब स्रक२ सौरभ३ ज्यों, विरला पहुँचे वीर ॥४०॥*
४०-४४ में सच्चे शिष्य का परिचय दे रहै हैं - नाना प्रकार की सुगन्ध वायु के साथ ही चलती है किन्तु माला२ की सुगन्ध३ बिना वायु भी गले में होने से एक स्थान से दूसरे को चली जाती है । वैसे ही भक्ति आदि नाना प्रकार के साधन सिद्ध१ गुरु के साथ रहने से ही चलते हैं किन्तु सच्चे साधक की श्रेष्ठ साधना गुरु के साथ न रहने पर भी चलती है ।
(क्रमशः)

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