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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ३३/३६*
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कोइ आइ स्तुती करै, कोइ निंदा करि जाइ ।
सुन्दर साधु सदा रहै, सबही सौं सम भाइ ॥३३॥
कभी कोई सांसारिक पुरुष उस साधक के सम्मुख आकर उस की प्रशंसा(स्तुति) करता है, तो कभी दूसरा आकर उस का अपमान या निन्दा करता है; परन्तु वह साधक सन्त इन दोनों के प्रति साधुभाव रखता हुआ उनसे सदा सद्व्यवहार ही करता है ॥३३॥
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कोऊ तौ मूरख कहै, कोऊ चतुर सुजांन ।
सुन्दर साधु धरै नहीं, भली बुरी कछु कांन ॥३४॥
ऐसे साधक के पास आने वाला कोई पुरुष उस की निन्दा करता हुआ उसे 'मूर्ख' कहता है, तथा कोई उसकी प्रशंसा करता हुआ उसको 'चतुर'(कुशल) कहता है । परन्तु वह(साधक) इन निन्दा स्तुति के वाक्यों से निरपेक्ष(उदास) रहता हुआ सबसे समान प्रेमपूर्ण व्यवहार ही करता है ॥३४॥
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कबहू पंचामृत भखै, कबहूं भाजी साग ।
सुन्दर संतनि कै नहीं; कोऊ राग बिराग ॥३५॥
ऐसे साधक को कभी भिक्षा में दूध, दही, घी, शक्कर, मधु आदि(पञ्चामृत) मिल जाता है; कभी उसे साक भाजी से ही पेट भरना पड़ता है; परन्तु उस साधक सन्त को इन दोनों ही स्थितियों से कोई राग(आसक्ति) या विराग(ग्लानि) नहीं होता ॥३५॥
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सुखदाई सीतल हृदैय, देखत सीतल नैंन ।
सुन्दर ऐसै संतजन, बोलत अमृत बैंन ॥३६॥
ऐसे पहुँचे हुए सन्त जनों का हृदय सब के प्रति सदा शीतल(शान्तिमय) एवं सुखमय रहता है तथा उन की दृष्टि भी सब के प्रति सदा स्नेहमय ही रहती है । वे सदा सब से मधुर वचनों से ही संवाद करते हैं ॥३६॥
(क्रमशः)

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