मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

*चांणक॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै ।*
*मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥*
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*चांणक॥*
सोचि कहौ रे सोचि कहौ । साच तजौ काँइ झूठ गहौ ॥टेक॥
औरै बच्छ गऊ तलि मेल्हा, कान्ह नहीं कोइ औरै खेल्या ।
बाल बह्मचारी गोप्याँ कहिया, जमुना पार तबै जाइ लहिया ॥
गौप्याँ के प्रीति ये काँइ बखाणौं, आप तिसा अगले कौं जाणैं ।
बषनां प्रीति लगाया लोड़ै, पद नहिं करै बिगोवा जोड़ै ॥५९॥
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भागवत आदि ग्रंथों का वास्तविक रहस्य न जानने वाले किन्तु उन्हीं का वाचन करके उदरपूर्ति करने वाले ब्राह्मणों को फटकारते हुए बषनांजी कहते हैं, हे ब्राह्मणों ! उन बातों को सोच-विचार करके कहो जिनको तुम प्रायः अपने श्रोताओं को व्यासगद्दियों पर बैठकर सुनाते हो । जिस बात को कहना हो, उसे सोच-विचार करके ही कहना चाहिये । क्यों व्यर्थ ही सत्य बात को त्यागकर झूठ का आश्रय ग्रहण करते हो ।
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उदाहरणार्थ तुम कहते हो, ‘ब्रह्मा ने गाय-बछड़ों को एक वर्ष तक ब्रज में से गायब करके पातालादि में छिपा दिया था क्योंकि उसे यह भ्रम हो गया था कि तत्समय ब्रजमण्डल में खेल्या = लीला कर रहा कान्हा स्वयं परात्पर-परब्रह्म न होकर कोई और सामान्य पुरुष है किन्तु श्रीकृष्ण तो परात्पर-परब्रहम परमात्मा थे ।
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उन्होंने ब्रह्मा के भ्रम को विदीर्ण करने के लिये तत्काल वैसे ही और उतने ही गाय-बछड़े बना दिये जितने ब्रह्मा ने चुराकर अपने पास छुपा करके रख लिये थे । एक बार गोपियाँ यमुना पार करते समय यमुना के अथाह जल में डूबने लगीं । तब उन्होंने यमुना से प्रार्थना की, हे यमुना मैय्या ! यदि श्रीकृष्ण बाल-ब्रह्मचारी है तो तू अपना अथाह रूप समेटकर हमें जाने का मार्ग दे दे । यमुना ने तत्काल गोपियों को मार्ग दे दिया ।
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इससे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण बालब्रह्मचारी थे । उनकी रासलीला विशुद्ध(कामहीन) लीला मात्र थी । हे ब्राह्मणों, कथावाचकों, गोपियों के प्रति ये क्या क्या और किस-किस प्रकार के झूठे कथन तुम करते हो ? जरा सोच-विचार करके अपनी बातों को कहो ।
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वस्तुतः इसमें तुम्हारा नहीं तुम्हारी प्रकृति व वृत्ति का दोष है । जैसी तुम्हारी प्रकृति और वृत्ति है, तुम अगले को भी वैसा ही बढ़ा चढ़ाकर कहते हो । वह असल में जो और जैसा है, वैसा तुम उसको बताते नहीं हो । वस्तुतः तुम उस श्रीकृष्ण से प्रीति लगाये घूमते-फिरते हो जो जन्मता और मरता है जबकि परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा न जन्मता और न मरता ही है । वह सदैव एकरस रहता है ।
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तुम उस परब्रह्म परमात्मा के तो पद नहीं बनाते हो जो निर्गुण-निराकार, एक, अकल, अविनाशी है उल्टे उसके गुनगान करते हो जो बिगोवा = नष्ट होता है, मृत्यु को प्राप्त होता है ॥५९॥ (चांणक और चेतावनी के अंगों में लगभग समान विषय ही होते हैं किन्तु कहने की शैली भिन्न होती है । उपदेश में बात सपाट शैली में, चेतावनी में सावधान करते हुए तथा चांणक में डाँटते-फटकारते हुए कही जाती है ।)
(क्रमशः)

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