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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग २१/२४
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भ्रमर सु तौ उज्जल भयौ, हंस भयौ फिरि स्यांम ।
को जानै केते भये, सुन्दर उलटे कांम ॥२१॥
मन रूप भ्रमर जो पहले विषयरूप पुष्पों पर बैठने से काला था वह अब भगवद्भक्ति से अपने मलविक्षेप प्रक्षालित कर उज्ज्वल हो गया । इसी प्रकार जीवात्मा रूप हंस सात्त्विकता के कारण उज्ज्वल था वह अब, श्यामसुन्दर भगवान के निरन्तर सम्पर्क(भगवद्भक्ति) के कारण श्यामवर्ण का हो गया । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस अध्यात्मक्षेत्र में ऐसे आश्चर्यमय वैपरीत्य(उलट फेर) कितने ही होते रहते हैं ॥२१॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १३) ॥
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अग्नि मथन करि नीसरी, लकरी सहज सुभाइ ।
पानी मथि घृत काढियौ, सो घृत सुन्दर खाइ ॥२२॥
साधक ने अपनी विरह अग्नि को अतिशय प्रज्वलित कर, या श्रवण मनन आदि से ज्ञान प्रकट कर लकड़ी काढी(ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न की ।) इस प्रकार सहज योग के अभ्यास से उसको आत्मसाक्षात्कार हुआ ।
इसी प्रकार, साधक ने पानी प्रेमा भक्ति को अथवा अन्तःकरण रूप तरल प्रवाहमय वृत्तियों में समुद्र को या संसार को मथकर विचार विवेकपूर्वक साधनचतुष्टय द्वारा ज्ञानरूप घृत(ब्रह्मानन्द) निकाला । वही घृत साधक को खाना चाहिये जिससे वह निरन्तर तदाकर वृत्ति का आनन्द ले सके ॥२२॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १४) ॥
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पात्र मांहिं झोली धरै, जोगी मांगै भीख ।
सोवै गोरख यौं कहे, सुन्दर गुरु की सीख ॥२३॥
लोक में हम देखते हैं कि भिक्षु लोग झोली में पात्र रखते हैं, परन्तु यहाँ विपरीत खेल हो रहा है । पात्र अर्थात् शुद्ध हृदय या मन में सांसारिक कर्मों के पाप-पुण्य भरे हुए हैं । उन कर्मों को सर्वथा त्याग दे । मन के शुद्ध होते ही शुभाशुभ कर्मों की ग्रन्थि स्वयं खुल जाती है । तब योगी(जिज्ञासु) ज्ञान की क्षुधा से पीडित होकर अपने गुरु तथा अनुभवी सन्तों से ज्ञान की भिक्षा मांगै(याचना करे) और उस समय "जागै जगत सोवै गोरख१"- इस वाक्य का बार बार मनन करे । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यहीं गुरुजनों की शिक्षा है ॥२३॥ (द्र० सवैया : २२/छ० सं० १५) ॥ (१ तु. – श्री भगवद्गीता - या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि, सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ अ० २, श्लो० ६९)
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पर धी लै करि घर धरै, पर धन हरि हरि खाइ ।
पर निंदा निस दिन करै, सुन्दर मुक्ति हो जाइ ॥२४॥
इस साषी का व्यावहारिक अर्थ तो किसी को भी चकित करने में समर्थ है; परन्तु इसका अध्यात्मिक अर्थ यह है –
परधन अर्थात् परमात्मसम्बन्धिनी बुद्धि को ले(ग्रहण) कर घर(स्वकीय अन्तःकरण या हृदय) में स्थिर रखना चाहिये ।
परधन(परमात्मज्ञान या पराभक्ति रूप धन या सन्तों से प्राप्त ज्ञानधन) का 'हरि हर' कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण तथा उपभोग करना चाहिये ।
परनिन्दा - आत्मा से भिन्न अनात्म(मायामय) पदार्थों की निन्दा(ग्लानि तथा त्याग) निशदिन(निरन्तर) करे । महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - ये उपर्युक्त तीनों कार्य करने वाले साधक की एक न एक दिन मुक्ति(मोक्ष = निर्वाण) हो ही जायगी - यह निश्चित है ॥२४॥ (द्र० सवैया : २२/छ० २२/१८) ॥
(क्रमशः)

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