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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१४५/१४८*
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*शिष मांही शिष सुरति है, गुरु माँहीं गुरु बैन ।*
*रज्जब ये राजी नहीं, तब लग झूंठे फेन ॥१४५॥*
१४५ में यथार्थ गुरु-शिष्य का परिचय दे रहे हैं - शिष्य में जिज्ञासा युक्त वृत्ति ही शिष्य है और गुरु में ब्रह्म संबन्धी वचन ही गुरु है । जब तक ये उक्त गुरु शिष्य प्रसन्नता पूर्वक न मिलें तब तक प्रतीति मात्र बाहर के गुरु-शिष्यादि का अभिनय जल के फेन के समान मिथ्या ही है ।
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*गुरु प्रसिद्ध पारस मिले, शिष्य ही खोटा जोय ।*
*रज्जब पलटे लोह सब, कंकर का क्या होय ॥१४६॥*
१४६ -१५५ में अयोग्य शिष्य का परिचय दे रहे हैं - पारस की यह बात प्रसिद्ध है कि वह सभी प्रकार के लोहे को सोना बना देता है किन्तु पारस से कंकर भी सोना हो सकता है क्या ? वैसे ही गुरु भी शिष्यों को संत बनाने में प्रसिद्ध हैं परन्तु जो शिष्य दोषों में पूर्ण हो और गुरु उपदेश से दोष न त्यागे वह कैसे संत बनेगा ?
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*सद्गुरु चंदन बावना, परस्यूं पलटे काठ ।*
*रज्जब चेला चूक में, रह्या बाँस के ठाट ॥१४७॥*
बावने चंदन के स्पर्श से काष्ठ चंदन हो जाते हैं किन्तु बाँस अपने पोलादि दोषों के कारण नहीं हो पाता । वैसे ही सद्गुरु के उपदेश से शिष्यों के हृदय बदल जाते हैं यदि कोई का न बदले तो उस का प्रमाद ही न बदलने में कारण होता है गुरु का नहीं ।
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*सद्गुरु चिन्तामणि मिल्या, शिष में चिन्ता नाँहिं ।*
*तो रज्जब कहु क्या मिले, जे माँगे नहिं माँहिं ॥१४८॥*
चिन्तामणी हाथ आजाने पर भी मन में किसी वस्तु की इच्छा न करे तो क्या मिलेगा ? वैसे ही सद्गुरु मिल जाने पर भी शिष्य के मन में उनसे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा न हो और न प्रश्न करे तो क्या मिलेगा ?
(क्रमशः)

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