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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग १३/१६*
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संतनि कै यह बनिज है, सुन्दर ज्ञान बिचार ।
गाहक आवै लेन कौं, ताही के दातार ॥१३॥
सन्तों के पास तो नानाविध ज्ञानविचार संगृहीत हैं; परन्तु जैसे कोई व्यापारी किसी ग्राहक को उसकी मांगी हुई वस्तु ही देता है; उसी प्रकार सन्त भी जिज्ञासु का उत्तम, मध्यम या कनिष्ठ अधिकार देखकर तदनुसार ही उसको उपदेश करते हैं ॥१३॥
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संतनि कै सौ बस्तु हैं, कबहूं खूटै नांहिं ।
सुन्दर तिनकी हाट तें, गाहक ले ले जांहिं ॥१४॥
सन्तों के पास ज्ञानोपदेश का अक्षय भण्डार है, उसमें कभी कमी नहीं आती । हाँ, जिज्ञासु ग्राहक वहाँ जितना और जैसा ज्ञान चाहिये उसे ग्रहण कर आगे बढ जाता है ॥१४॥
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साह रमइया अति बडा, खोलै नहीं कपाट ।
सुन्दर बांन्यौटा किया, दीन्ही काया हाट ॥१५॥
भगवान् तो भक्ति के बड़े व्यापारी(थोक व्यापारी) हैं, वे साधारण भक्त के लिये अपना द्वार नहीं खोलते । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं – उनने साधारण भक्तों के लिये सन्तों को अधिकृत कर दिया है । अतः वे सन्तजन सभी भक्तों को(पात्र कुपात्र का ध्यान रखते हुए) ज्ञानोपदेश करते हैं ॥१५॥
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अपना करि बैठाइया, कीया बहुत निहाल ।
जो चाहै सो आइ ल्यौ, सुन्दर कोठीवाल ॥१६॥
इस भक्तिक्षेत्र में कुछ बड़े अधिकारी सन्त हैं । उन्हें बड़े व्यापारी के रूप में कोठीवाल(आढतिया) कहा जा सकता है । वे किसी उत्तम जिज्ञासु को अधिकारी समझ कर उसे आत्मीय भाव से अपने पास ससम्मान बैठा कर उस के मुँहमाँगे भक्ति ज्ञान का उपदेश करते हैं ॥१६॥
(क्रमशः)

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