गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

*१९. साधु कौ अंग ३७/४०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
*१९. साधु कौ अंग ३७/४०*
.
क्षमावंत धीरज लिये, सत्य दया संतोष । 
सुन्दर ऐसै संतजन, निर्भय निर्गत रोष ॥३७॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे सन्तजन सभी के प्रति क्षमाशील, धैर्यवान् रहते हुए सत्यमय, सन्तोषमय एवं दयामय व्यवहार करते हुए संसार में सर्वत्र निर्भय एवं द्वेषरहित होकर विचरण करते हैं ॥३७॥
.
द्वंद कछू ब्यापै नहीं, सुख दुख एक समान । 
सुन्दर ऐसै संतजन, ह्रदै प्रगट दृढ ज्ञान ॥३८॥
संसार में विचरण करते हुए ऐसे सन्त जनों को सुख दुःख, मान अपमान या जय पराजय आदि का द्वन्द्व कभी विचलित नहीं करता । ऐसे सन्त जन तो साक्षात्कृत निरञ्जन निराकार प्रभु के मनन एवं चिन्तन में ही निरन्तर दृढतया मग्न रहते हैं ॥३८॥
.
घर बन दोऊ सारिखें, सबतें रहत उदास । 
सुन्दर संतनि कै नहीं, जिवन मरन की आस ॥३९॥
ऐसे सन्त जन घर(समाज) या वन(एकान्त) में रहते हुए भी वहाँ कोई आसक्ति नहीं रखते । वे सब के प्रति उदास(उपेक्षा) भाव रखते हुए ही सर्वत्र विचरण करते हैं; क्योंकि उनको अपने जीवन मरण के प्रति भी कोई व्यामोह नहीं रह गया है ॥३९॥
.
रिद्धि सिद्धि की कामना, कबहूं उपजै नांहिं । 
सुन्दर ऐसै संतजन, मुक्त सदा जग मांहिं ॥४०॥
इन सन्तों के हृदय में, सांसारिक व्यवहार चलाने के लिये, किसी प्रकार को ऋद्धि सिद्धि की कामना भी जाग्रत् नहीं होती । संसार में ऐसे ही सन्तजन सदा जीवन्मुक्त रहते हुए विचरण करते हैं ॥४०॥
(क्रमशः)  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें