बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६९/१७१*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरुदेव का अंग ~१६९/१७१*
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*रज्जब कागज पूजिये, वेद वचन बिच आथि१ ।*
*तो गुरु को किन२ पूजिये, जाके गोविन्द साथि ॥१६९॥*
१६९ में गुरु की पूजा करने की प्रेरणा कर रहे हैं - वेद-वचन रूप पूंजी१ जिन कागजों में होती है, वे कागज भी पूजे जाते हैं, तब जिनके साथ भगवान हैं उन गुरुदेव की पूजा क्यों न२ की जाय ? गुरु की पूजा अवश्य करनी चाहिये ।
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*जड़ मूरति उर नाम बिन, तापर मंगलाचार ।*
*तो रज्जब कर आरती, गुरु पर बारंबार ॥१७०॥*
१७० में गुरु की आरती बारम्बार करने की प्रेरणा कर रहे हैं - जो पत्थर, काष्ठ, मिट्टी, सुवर्ण आदि धातुओं की बनी जड़ मूर्ति जिसके हृदय में हरि नाम भी नहीं होता, उसके लिये मंगल कार्य करते हुए उसकी आरती करते हैं, तब चेतन और हरि नाम चिन्तन युक्त हृदय वाले गुरुदेव की आरती तो बारम्बार करनी चाहिये ।
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*शिला सँवारी राज नें, ताहि नवै सब कोय ।*
*रज्जब शिष सद्गुरु गड़े, सो पूजा किन होय ॥१७१॥*
१७१ में गुरुदेव की पूजा करने की प्रेरणा कर रहे हैं - राज जब साधारण शिला की मूर्ति बना देता है तब सब उसको प्रणाम करते हुये उसकी पूजा करते हैं, फिर सद्गुरु तो अपने उपदेश द्वारा शिष्यों को ठीक करके परमात्मा से मिला देते हैं, वे पूजा के पात्र क्यों न होंगे ? सद्गुरु की पूजा अवश्य करनी चाहिये ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “३. गुरुदेव का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः) 

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