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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ४१/४४
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बन में एक अहेरिये, दीनी अग्नि लगाइ ।
सुन्दर उलटै धनुष सर, सावज मारै आइ ॥४१॥
एक शिकारी(साथक सन्त) ने विषय भोग रूप वन में ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित कर दी । तथा वहाँ उसने अपना ध्यान रूप धनुष वाण सजा कर चित्त वृत्ति रूप लक्ष्य के समीप आने वाले दुष्ट पशु(सावज) रूप क्राम क्रोध आदि विकारों को मारना आरम्भ किया ॥४१॥ (द्र० – सवैया : २२/छ० २९) ।
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मार्यौ सिंह महा बली, मार्यौ व्याघ्र कराल ।
सुन्दर सबही घेरि करि, मारी मृग की डाल ॥४२॥
वहाँ उस साधनाकाल में उस साधक ने शिकारी के रूप में अपने अहङ्कार एवं कामवासना रूप महाबली सिंह को मार(निगृहीत कर) दिया । भयङ्कर व्याघ्र रूप बहिर्मुख मन को भी नियन्त्रित किया । इतना ही नहीं, उस साधनावस्था में मृग-समूह रूप अपने दुर्गुणों को भी नष्ट कर दिया । ऐसे उसने स्वचित्त को साधना में लगाया ॥४२॥ (द्र० – सवैया २२/छ० २९) ॥
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सुन्दर सरवर सूकतें, कंवल प्रफुल्लित होइ ।
हंस तहां क्रीडा करै, पंखी रहै न कोइ ॥४३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - तब उस साधक के लिये भवसागर रूप मानसरोवर(तृष्णा रूप जल न होने से) सूख जाने पर साधक का हृदयकमल प्रमुदित(शुद्ध) हो गया । वहाँ हंस रूप साधक सन्त भक्तिरस का आनन्दानुभव करने लगे, परन्तु संसारी जीवरूप अन्य पक्षी की चित्तवृत्ति वहाँ नहीं पहुँच सकी ॥४३॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० ३०) ॥
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कूप उसार्यौ कुंभ मैं, पानी भर्यौ अटूट ।
सुन्दर तृषा सबै गई, धापे चार्यौं खूंट ॥४४॥
श्रीसुन्दरदासजी की इस उलटवांसी का आध्यात्मिक अर्थ यह है - साधक में वासनारूप जल से परिपूर्ण विषय भोग रूप कूप(कुआ) को अपने शुद्ध मन रूप घट(कुम्भ) में उतार दिया । वह ज्ञान रूप जल से परिपूर्ण होने के कारण अतिशय शुद्ध था, अतः वह विषयादिक से रहित होने से तृष्णाओं से दूर हो चुका था । उस जल से सभी पिपासुओं की तृष्णा दूर हो गयी । तथा उस जल को पी कर अन्तःकरणचतुष्टय(= चारों खूंट) तृप्त हो गये ॥४४॥
(क्रमशः)

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