🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तुम बिन तारण को नहीं, दूभर यहु संसार ।*
*पैरत थाके केशवा, सूझै वार न पार ॥*
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*विनती ॥*
भौसागर मेरे राम नरेसा ।
तुम बिन कौंन काढै कर गहि केसा ॥टेक॥
थाघ नहीं भौसागर मांहीं । वारपार सूझै कछु नांहीं ॥
ऊची नीची आवै प्राण रहै न ऊभा । लहरि लहरि मैं, डाभक डूभा ॥
भगति परोहण ऊपरि, चाढीजै । बाँह दे बाँह डूबता काढीजै ॥
तू बोहिथ भौ तारणहारा । बषनां बोल्या यहु बिड़द तुम्हारा ॥६९॥
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हे मेरे प्रियतम राजाराम ! आपके अतिरिक्त मेरे केशों को पकड़कर कौन मुझे संसार रूपी सागर में डूबते हुए को बाहर निकाल सकता है । क्योंकि संसार रूपी सागर की थाघ = सीमा = गहराई की सीमा का तो पता है ही नहीं, इसके एक किनारे से दूसरे किनारे तक की लम्बाई चौड़ाई का भी कुछ पता नहीं चलता है ।
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इस संसार रूपी सागर में वर्तते समय कभी अच्छी स्थिति और कभी बुरी स्थिति मालूम पड़ती है जिसके कारण प्राण = जीव स्थिर नहीं रह पाता है । प्रत्येक क्षण-क्षण में कभी डूबने और कभी जल के ऊपर आने का अनुभव होता है । चित्त डाँवाडोल हो जाता है । डाँवाडोल चित्त से न लोक सुधरता है और न परलोक सुधरता है । संशय की स्थिति बनी रहती है और ‘संशयात्मा विनश्यति’ संशयात्मा का नाश हो जाता है ।
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अतः हे राजाराम ! मुझे आपकी अनन्यभक्ति रूपी नौका में चढ़ा दीजिये । अपना बाँह = आश्रय = सहारा प्रदान करके मुझ डूबते हुए को बाहर निकाल दीजिये । भाव सागर से पार होने के लिये आप जहाज रूप हैं । मैं बषनां इस बात को ठोक बजाकर कहता हूँ क्योंकि आपके बारे में पुराना इतिहास यही कहता आ रहा है, आपका सुयश उक्त प्रकार का ही है ॥६९॥

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