शनिवार, 14 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ९/१२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ९/१२
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सुन्दर संमरथ राम कौं, कहत दूरि तैं दूरि । 
पलक मांहिं प्रगटै सही, हृदये मांहि हजूरि ॥९॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते है - हमारे शास्त्र उन राम को हम से बहुत अधिक दूर(दूरि तैं दूरि) बता रहे हैं; परन्तु इसके विपरीत, हमारा अनुभव यह है कि वे तो हम सब के हृदयों में विराजमान हैं अतः वे हमारे समीप से समीपतम हैं । वे हमारे सङ्कट में घिरने पर क्षण भर में ही साक्षात् प्रकट होने की स्थिति में हैं ॥९॥
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सुन्दर संमरथ राम की, महिमा कही न जाइ । 
देखहु या आकाश कौं, क्यौं करि राख्यौ छाइ ॥१०॥
ऐसे सामर्थ्यशाली उन प्रभु राम की महिमा का वर्णन शब्दों में कौन कर सकता है । उनके असीम सामर्थ्य का यही उदाहरण है कि उन ने, बिना किसी स्तम्भ आदि आधार के, कितना विशाल(लम्बा चौड़ा) यह आकाश पृथ्वी पर आवृत कर दिया है ! ॥१०॥
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सुन्दर अगम अगाध गति, पल मैं बादल होइ । 
गरजै चमकै बिज्जली, बरखन लागै तोइ ॥११॥
उनकी एक अन्य सामर्थ्य का यह अगम्य एवं अबोध्य उदाहरण भी देखो कि वे स्वच्छ आकाश को कुछ ही क्षण में ऐसी घनघोर घटा से आच्छादित कर देते हैं कि वहाँ बिजली कड़कने लगती है और मूसलाधार वर्षा(तोइ = तोय = जल) होने लगती है ॥११॥
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पल मैं कछुव न देषिये, सुद्ध रहै आकाश । 
सुन्दर समरथ रामजी, उतपति करै रु नाश ॥१२॥
कैसे आश्चर्य की बात है कि अभी जहाँ कुछ देर पहले जहाँ स्वच्छ आकाश दिखायी दे वहाँ ये हमारे समर्थ प्रभु चाहें तो एक ही क्षण में साधारण वर्षा से खेतों में खेती लहलहा सकती है या वे ऐसी प्रलयङ्कर वर्षा कर सकते हैं कि उस से बाढ आने के कारण अनेक ग्राम एवं नगर डूब सकते हैं ॥१२॥
(क्रमशः) 

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