गुरुवार, 12 मार्च 2026

श्रीदादूवाणी का जुलूस ~

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
श्रीदादूवाणी का जुलूस ~ 
अष्टमी शताब्दी का प्रमुख दिन था । वि. सं. १६०१ की फा. शु. ८ को ही श्रीदादूजी भारत भूमि पर पधारे थे । आज उन्हें ४०० वर्ष हो गये थे । उनका पुनीत उपदेश आज भी संसार के अनन्त क्लेशों से सन्तप्त प्राणियों को पूर्ण शांति प्राप्त कराने का साधन है । 
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आज का प्रमुख आयोजन ‘श्रीदादूजी महाराज की वाणी का जुलूस’ था । क्योंकि  दादूजी का यही सच्चा स्मारक आज तक  उसी रुप में प्रस्तुत है । मंदिर में सुबह ४०१ पाठों की समाप्ति आज ही हुई थी । वहीं से वाणीजी की उतार कर पुस्तक की सवारी आरंभ हुई । सभा मंडप तक सवारी महात्मा अपने शिर पर धारण करके लाये । मंदिर से सभा मंडप तक आचार्य रामलालजी महाराज व संपूर्ण महन्त संत पैदल पैदल वाणीजी की सवारी के साथ थे ।
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सभा मंडप से वाणीजी का आरोहण जमात उदयपुर के गजराज पर हुआ । आचार्य रामलालजी महाराज दूदू के हाथी पर विराजे । अन्य सब संत, महन्त, महात्मा व भक्तजन पैदल सवारी के साथ थे । सब के आगे नौबतें थीं उनके पीछे झण्डा, पश्‍चात् जबूरों की सवारियां थीं । उनके पीछे जमातों के कारखानों के बाजे थे । उनके पीछे साज सज्जा से सज्जित घोडे थे । उनके पीछे किशनगढ स्टेट का बैण्ड बाजा था । 
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फिर दादू पन्थियों की जमातों के शस्त्रवित् जिनको ‘‘खंडेत’’ संज्ञा से सम्बोधन करते हैं, वे अपने अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित अखाडों सहित थे । सीकर तथा नवलगढ से व्यायाम शालाओं के शिक्षक व शिक्षित व्यायाम प्रदर्शक मंडलिये थीं । स्वामी गोपालजी व्यायामाचार्य अपनी दादू महाविद्यालय के छात्रों की व्यायाम मंडली के साथ सम्मिलित थे । 
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उनके पीछे भजन मंडिलयें व दादूराम की ध्वनि करने वाली मंडिलयें थी । स्थान पर व्यायाम का प्रदर्शक बैंड की मधुर ध्वनि व जंबूरों के शब्दों का तुमुल घोष होता जा रहा था । साधु समुदाय व दर्शक सभी दादूजी की परम भक्ति में श्रद्धा से प्रेम विभोर हो रहे थे । इस प्रकार का शांतिप्रद जुलूस अब तक नारायणे में नहीं देखा गया था । यह बात वयोवृद्ध महात्मा व नागरिकों के मुख से मुख से निकल रही थी । 
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नौ बजे सुबह का आरंभ हुआ जुलूस १ बजे वापिस मंदिर में पहुँचा था । छतरियों पर कीर्तन व खेजडेजी के दर्शनों के महत्व का भी आज का ही प्रमुख दिन था । सब लोग निराहार थे । इसलिये आज के दिन अन्य कार्यक्रम स्थगित करना पडे । रात्रि को नाम कीर्तन व भजन जागरण का प्रोग्राम था । सभा मंडप में ही ८ बजे से प्रात: तक नाम कीर्तन व भजन का प्रवाह प्रवाहित रहा । इस प्रकार शताब्दी उत्सव के पूर्वार्द्ध की आज समाप्ति हो गई थी । 
(क्रमशः)

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