गुरुवार, 12 मार्च 2026

*भक्ति-महिमा ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार ।*
*दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥*
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*भक्ति-महिमा ॥*

सरणैं आया ते काढि न दीया । भौ भान्यौं जन निरभै कीया ॥टेक॥
हा प्रभु हा प्रभु दीन ह्वै भाखी । ताकी लाज सभा मैं राखी ॥
जल थल गिर ज्वाला बहु जाली । प्रह्लाद की पैज पले त्यौं पाली ॥
निहचल राज साध कौं दीया । चलै नहीं धू निहचल कीया ॥
ग्राहि गह्यौ गज सकुंटि आयौ । म्हारौ म्हारौ करतौ धायौ ॥
अंतकालि राम नाम पुत्र हेति लीयौ । जम कौं टालि आपनौं पद दीयौ ॥
गउ जिलाइयौं तमकि बुलायौ । नामदेव की बाहर बीठल आयौ ॥
वै जालै वै गाडण लागा झगड़ौ मचायौ । 
अदग कबीरा राख्यौ देही दाग न लायौ ॥
बखनैं बिड़द तुम्हारौ गायौ । सबल देखि सरणाई आयौ ॥६८॥

भक्ति का शरणागति एक महत्त्वपूर्ण अंग है । आत्मनिवेदनात्मक नवम्भक्ति ही शरणागति है । बषनांजी परमशरण्य परब्रह्म-परमात्मा से स्वयं को अपनी शरण में पुराने इतिहास की स्मृति कराकर रखने का निवेदन करते हैं ।
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वे कहते हैं, हे परात्पर-परब्रहम-परमात्मा ! तेरी शरण में जो भी आये, उन्हें तूने अपनी शरण में रखा है, उन्हें अपनी अभय शरण से कभी भी निकाला नहीं है । उनका भौ = आवागमन का चक्र मिटाकर उन्हें सदा के लिये जन्म-मृत्यु रूप भय से विमुक्त किया है । (शरणागति का रहस्य जितना और जिसप्रकार विभीषण तथा राम के चरित्र से उत्तमरीत्या हृदयंगम होता है उतना अन्य किसी चरित्र से नहीं । शरणागत भक्तों में आदर्श विभीषण तथा शरण्यों में आदर्श श्रीराम का सर्वोच्च है । इस तत्त्व की मीमांसा वाल्मीकि रामायण पर भूषणराज की टीका में अत्युत्तम रीत्या की गई है ।)
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जिस पांचाली द्रोपती ने हा कृष्ण ! हा द्वारिकावासिन् वासुदेव ! पुकारकर तुझसे अपनी लज्जा बचाने की प्रार्थना की थी उसकी भरी सभा में साड़ी बढ़ाकर तूने लाज बचाई थी । प्रहलाद की पैज = प्रतिज्ञा = रामनाम-स्मरण-व्रत जिसप्रकार भी, जैसे भी सुरक्षित रह सकता था, वैसे ही तूने प्रयत्न किये और सुरक्षित रखा । उसे जल से बचाया, थल पर हाथी द्वारा रौंदे जाने पर बचाया, पर्वत से गिराने पर सुरक्षित रखा । और तो और भयंकर अग्नि में जलाने पर भी उसे जलने न दिया, सर्वथा सुरक्षित बचा लिया ।
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सज्जन बालक ध्रुव को निश्चल राज प्रदान किया । उसका राज अचल है । वह कभी भी नाश नहीं होता । अर्थात् ध्रुव को अचल राज ही प्रदान नहीं किया उस स्वयं को भी निश्चल कर दिया । गज को जल पीते समय ग्राह ने पकड़ लिया जिससे गज पर भयंकर संकट आ पड़ा । उसने आपको याद किया । तत्काल मेरा भक्त संकट में है, मुझे तत्काल पहुंचना है, कहते-कहते आप उसके पास पहुँच गये तथा उसकी ग्राह को मारकर रक्षा की ।
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अजामिल नामक पापी ब्राह्मण ने पुत्र के नाम के मिस से मरते समय आपका नाम पुकारा । आपने यमराज के दूतों को भगाकर उस अधमाधम ब्राह्मण अजामिल को अपने बैकुण्ठ लोक में अचल निवास प्रदान किया । जब झूठे आरोप में नामदेव को क्रोधित होकर मुस्लिम हाकिम ने बुलाया तब आपने कुटिया से बाहर निकलकर मृत गाय को जिला दी और नामदेव को कारागार के बंधन से मुक्त करा दिया ।
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हिन्दू कबीर को जलाने की जिद पर अड़ गये । मुस्लिम गाड़ने की जिद करने लगे । दोनों में झगड़ा होने लगा । आपने कबीर की देह के स्थान पर फूल उत्पन्न करके कबीर को अदाग ही कर दिया । उसके शरीर को दाग लगाने की आवश्यकता ही नहीं रहने दी । बषनां आपके सुयश का बखान करता है तथा आपको समर्थ शरण्य(शरणागतरक्षक) जाण कर आपकी शरण में आया है ॥६८॥
(क्रमशः)

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