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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग ५/८
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सुन्दर संमरथ राम की, मो पै कही न जाइ ।
पलही मैं जल थल भरै, पल मैं धूरि उडाइ ॥५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे समर्थ प्रभु की स्तुति(प्रशंसा) के लिये मेरे पास वैसी शब्दावलि(सशक्त वाणी) ही नहीं है । उन में ऐसा अपूर्व सामर्थ्य है कि वह क्षण भर में घन घोर वर्षा कर स्थल(शुष्क भूमि) को जलमय कर सकते हैं तथा उसके दूसरे ही क्षण उस जलमय भूमि को ऐसी सूखी(जलविहीन) कर देते हैं कि वहाँ सब ओर धूल उडने लगती है ॥५॥
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सुन्दर संमरथ राम कौं, करत न लागै बार ।
पर्वत सौं राई करै, राई करैं पहार ॥६॥
हमारे सर्वप्रथम निरञ्जन निराकार प्रभु राई को पर्वत के रूप में परिवर्तित करने में कोई विलम्ब नहीं लगाते और न उन को किसी विशाल पर्वत को राई के समान सूक्ष्म बनाने में ही कोई विशेष समय लगता है ॥६॥
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सुन्दर सिरजनहार कौं, करतें कैसी शंक ।
रंकहि लै राजा करै, राजा कौं लै रंक ॥७॥
इसी प्रकार वे किसी राजा को रंक(दरिद्र) बनाने में या किसी अकिंचन दरिद्र को सर्वविध ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट् बनाने में कोई विलम्ब नहीं लगाते और न उन को ऐसा करने में कोई भय या शङ्का ही होती है ॥७॥
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सुन्दर सिरजनहार की, सबही अद्भुत बात ।
गर्भ मांहिं पोखत रहै, जहां गम्य नहिं मात ॥८॥
उन सिरजनहार के किन किन विशिष्ट कर्मों की प्रशंसा करें । उन के तो सभी कार्य निराले(विशिष्ट) ही हैं । अब देखिये ना ! वह गर्भावस्था में भी हमारी सर्वथा रक्षा करता रहता है, जब कि वहाँ माता तक का भी हाथ नहीं पहुँच पाता ! ॥८॥
(क्रमशः)

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