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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ४८/५०
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ऊजर मैं बस्ती भई, बस्ती भई उजारि ।
सुन्दर उलटे पेच कौं, पंडित देखि बिचारि ॥४८॥
अब हमें निर्जन एकान्त स्थान ही साधना के अनुकूल लगने लगा, तथा सांसारिक लोगों की भीड़ से अरति(ग्लानि) होने लगी१ । हमारी चर्चा में इस विपरीतता का यथार्थ कोई ज्ञानी जन(विवेकी) ही समझ सकता है; साधारण (सांसारिक) जन के लिये इस का समझना बहुत टेढी खीर है ॥४८॥
(१ तु० – श्रीमद्भगवद्गीता : विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि । - भ० गी० १३/१०
अथवा –
विविक्तदेशसेवी लध्वाशी यतवाक्कायमानसः ॥
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ - भ० गी० १८/५२.)
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नीच सु तौ ऊंचौ भयौ, ऊंचौ हूवौ नीच ।
सुन्दर उलटौ ज्ञान है, इनि साखिन कै बीच ॥४९॥
गुरुपदेश के प्रभाव से साधक की चर्चा में वैपरीत्य आ ही जाता है । साधना से पूर्व कुसङ्ग के कारण जो हीनचरित्र दिखायी देता था वही अब सत्सङ्ग करने से उत्तम चरित्र लगता है । परन्तु साधनाभ्यास से पूर्व जो कुसङ्ग उस की दृष्टि में उच्च था उसे ही अब वह फूटी आँखों से भी नहीं देखना चाहता । यह सब गुरु के उपदेश का ही माहात्म्य है ।
ऊपर की सभी साषियों से महात्मा ने अपना यही भाव प्रकट किया है ॥४९॥
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सुन्दर सब उलटी कही, संमुझै संत सुजांन ।
और न जांनै बापुरे, भरे बहुत अज्ञांन ॥५०॥
इति बिपर्ज्जय को अंग ॥२०॥
इन उपर्युक्त सभी ४९ साथियों से सन्तों की जिस चर्चा का बोध कराया है, महात्मा सुन्दरदाससी कहते हैं - इसका महत्त्व कोई ज्ञानी सन्त ही समझ सकता है । अन्य किसी साधारण पुरुष का यह सामर्थ्य नहीं है कि वह इसका यथार्थ मर्म समझ सकें; क्योंकि उसकी बुद्धि पूर्णतः अविद्या(अज्ञान) से आवृत है ॥५०॥
इति विपर्यय को अंग सम्पन्न ॥२०॥
(क्रमशः)

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