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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ १/४*
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गुरु शिष्य निदान निर्णय अंग के अनन्तर गुरु मुख से उपदिष्ट साधन द्वारा होने वाले कष्ट और उससे शिष्य की होने वाली उन्नति तथा परीक्षा का परिचय देने के लिये गुरु मुख कसौटी का अंग कह रहे हैं ।
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*गुरु ज्ञाता परजापती१, सेवक माँटी रूप ।*
*रज्जब रज सौं फेरि कर, घडले कुंभ अनूप ॥१॥*
ज्ञानी गुरु कुंभकार१ के समान है ओर शिष्य मिट्टी के समान है । जेसे कुंभकार पृथ्वी की रज को कूटना आदि कष्ट देकर अनुपम कलश बना देता है, वैसे ही गुरु साधन कष्ट देकर साधारण प्राणी को भी अति श्रेष्ठ संत बना देते हैं ।
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*सेवक कुंभ कुंभार गुरु, घड़१ घड़ काढे खोट ।*
*रज्जब माँहिं सहाय कर, तब बाहर दे चोट ॥२॥*
शिष्य घट के समान है और गुरु कुंभार के समान हैं, जैसे कुंभार घड़े के चोट१ लगा लगा कर उसका दोष निकालता है किन्तु पहले भीतर कपड़ा - युक्त हाथ से सहायता करता है, तब बाहर से थप्पी की चोट लगाता है । वैसे ही गुरु भीतर से हित चाहते हुये ही शिष्यों को साधन का कष्ट देता है ।
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*क्रोध न करहिं कुलाल गुरु, दीसे बहु विधि मार ।*
*रज्जब निपजे पात्र क्यों, बिन कसणी व्यवहार ॥३॥*
कुंभार मिट्टी पर नाना प्रकार के आधात लगाता है किन्तु क्रोध नहीं करता कारण - कूटना, पीटना, तपाना आदि कष्टप्रद व्यवहार करे बिना तो पात्र बनता ही नहीं । वैसे ही गुरु क्रोध न करके ही शिष्य पर कठोर वचन और साधन कष्ट देना आदि व्यवहार करते देखे जाते हैं, कारण, बिना उक्त व्यवहार के शिष्य ब्रह्म साक्षात्कार करने योग्य होता ही नहीं ।
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*सद्गुरु शंका ना करै, जैसे लोह लुहार ।*
*रज्जब मारे महरकर, ताय१ करे तत२ सार३ ॥४॥*
जैसे लुहार लोह पर चोट मारते समय यह शंका नहीं करता कि यह नष्ट हो जायेगा, वह तो लोह को पहले से अच्छा बनाने की भावना से ही तपा१-तपा कर श्रेष्ठ३ बनाता है । वैसे ही गुरु शिष्य को साधन-कष्ट देते समय यह शंका नहीं करते कि - इसकी हानि होगी, वे तो दयापूर्वक वचन-बाण मारते हैं और ज्ञानाग्नि२ से तपा-तपा कर ब्रह्मनिष्ठ बना देते हैं ।
(क्रमशः)

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