बुधवार, 18 मार्च 2026

२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २९/३२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग २९/३२
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आज्ञा मांहीं लच्छमी, ठाढी है कर जोरि । 
सुन्दर प्रभु सनमुख रहै, दृष्टि सकै नहिं चोरि ॥२९॥
धन की देवी लक्ष्मी भी उन प्रभु के सम्मुख आज्ञापालन - हेतु उन के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ी रहती है । वह इस अज्ञापालन में कभी आँख नहीं चुरातीं (आज्ञापालन से मुख नहीं मोड़तीं) ॥२९॥
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आज्ञा मांहैं तत्व सब, होइ देह कौ संग । 
सुन्दर बहुरि जुदे रहैं, आज्ञा करै न भंग ॥३०॥
'पञ्चतत्त्व' या 'पञ्च महाभूत' कहलाने वाले पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश, उन महाप्रभु के आदेश से, प्राणियों के देह में सङ्घात रूप से एकत्र होते हैं । तथा उन का जब आदेश होता है तो वे उस देह को छोड़कर यथास्थान चले जाते हैं । वे उस महाप्रभु की आज्ञा कभी भङ्ग नहीं करते ॥३०॥
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आज्ञा मांहैं रहत हैं, सप्त दीप नौ खंड । 
सुन्दर प्रभु की त्रास तें, कंपै सब ब्रह्मंड ॥३१॥
सप्तद्वीप - जम्बुद्वीप, शाकद्वीप, सूक्ष्मद्वीप, क्रौञ्चद्वीप, गोमयद्वीप, श्वेतद्वीप एवं लक्षद्वीप एवं नव खण्ड(पृथ्वी के नौ भाग) - भारत, इलावृत्त, किम्पुरुष, भद्र, केतुमाल, हरि, हरिण्य, रम्य एवं कुश - ये सभी उस प्रभु की आज्ञा में रहते हैं । संक्षेप में यह कह सकते हैं कि यह समस्त संसार(ब्रह्माण्ड) उस प्रभु के भय से काँपता रहता है(कि वे रुष्ट न हो जायँ) ॥३१॥
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ऐसै प्रभु की त्रास तें, कंपै सब ही लोक । 
बार बार करि कहत हैं, सुन्दर तुम कौं धोक ॥३२॥
ऐसे आप सर्वशक्तिसम्पन्न उस निरञ्जन निराकार प्रभु के क्रोध से सभी संसारी जीव भय मानते हैं; अतः हे प्रभो ! आप का परम भक्त यह सुन्दरदास आप को बार बार प्रणाम(= धोक) करता है ॥३२॥
(क्रमशः) 

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