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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२१. समर्थाई आश्चर्य को अंग १३/१६
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एक बूंद तें चित्र यह, कैसौ कियौ बनाइ ।
सुन्दर सिरजनहार की, रचना कही न जाइ ॥१३॥
उन की रचना का एक आश्चर्यमय उदाहरण यह है कि वे एक विन्दु(शुक्रविन्दु) से इतनी विशाल एवं विचित्र सृष्टि कर देते हैं, उन की इस रचना का यथातथ वर्णन करने में किसी की सामर्थ्य नहीं है ॥१३॥
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जड़ चेतनि संयोग करि, अद्भुत कीयौ ठाट ।
सुन्दर समरथ रामजी, भिन्न भिन्न करि घाट ॥१४॥
उन ने इस सृष्टि में जड एवं चेतन को संयुक्त कर भिन्न भिन्न रचनाओं में आश्चर्यमय ऐसे आकार(ढाँचा = ठाट) बना दिये कि हम लोग देखते ही रह जाते हैं ॥१४॥
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करै हरै पालै सदा, सुन्दर संमरथ राम ।
सबही तैं न्यारौ रहै, बस मैं जिन कौ धांम ॥१५॥
उन समर्थ प्रभु के इस सृष्टिरचना में तीन अद्भुत कार्य हैं - १. वे इस सृष्टि की रचना भी करते हैं और २. इस सृष्टि का पालन भी करते हैं, तथा ३. वे इस सृष्टि का संहार भी करते हैं । इतना सब करने पर भी, वे सब से पृथक्(तटस्थ) भी रहते हैं । तथा सब के हृदय में भी वे विराजमान हैं ॥१५॥
अंजन यह माया करी, आपु निरंजन राइ ।
सुन्दर उपजत देखिये, बहुर्यौं जाइ बिलाइ ॥१६॥
उन समर्थ प्रभु ने स्वयं निरञ्जन(मायारहित) रहते हुए अपनी इस सृष्टि को मायिक एवं अविद्यायुक्त बना दिया । इस अविदया के कारण ही यह सृष्टि उत्पन्न एवं विनष्ट होती रहती है ॥१६॥
(क्रमशः)

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