शनिवार, 14 मार्च 2026

*विनती ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और ।*
*मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥*
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*विनती ॥*
तूँ जिनि छाडै बिड़द तुम्हारौ ।
धीग धौल धुर खैंचण हारौ ॥टेक॥
निबल परोहण भार सब लीया ।
भवसागर मैं गाडा गलिया ॥
तूँ घणाँ भार कौ जूपणहारौ ।
ज्यूँ जाणौं त्यूँ पार उतारौ ॥
तैं गलिया काढ्या देव मुरारी ।
पड़ि मति रहौ हमारी बारी ॥
बषनां कह हरि जूड़ी साहौ ।
पाण करौ पूरौ निरवाहौ ॥७०॥
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जिनि = मत । बिड़द = सुयश, प्रण, प्रतिज्ञा, व्रत, स्वभाव । धीग = गहरा, यहाँ समुद्र से तात्पर्य है । धौल = मस्तक । धुर = प्रथम, सबसे पहला हिस्सा, यहाँ केशों से तात्पर्य है । निबल = कमजोर । परोहण = नौका, यहाँ निर्बल भक्ति से तात्पर्य है । भार = पाप, कुकर्म ।
गाड़ा गलिया = आकंठ फँस गया हूँ । जूपणहारौ = जुवे में जुतकर गाड़ी को खींचकर ले जाने में समर्थ । पड़ि मति = आलस्य मत करो, सोवो मत । जूड़ी = गाड़ी का जुवा जिसमें बैल जुतकर गाड़ी को खींचते हैं । साहो = संभाल लो । पाण करौ = कृपा करो । पूरौ निरवाहौ = पूर्ण रूप से निर्वाह करो, संसार सागर से पर करो ।
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परमात्मा का नियम है “सन्मुख होहिं जीव मोहिं जबही । जन्म कोटि अघ नासहिं तबही ॥ जिस समय जीव परमात्मा की शरण का अवलम्बन ग्रहण करता है उसीसमय वह उसके अनंतों जन्मों के समग्र पापों का समूल नाश कर देता है ।
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इस पद में बषनांजी परात्पर-परमात्मा को उसके इसी व्रत का स्मरण कराते हैं । हे परमात्मा ! आप अपना व्रत मत छोड़िये । मैं गहरे संसार सागर में डूबा जा रहा हूँ । मेरे केशों को पकड़कर मुझे बाहर निकालने वाले मात्र आप हैं, आपकी अहैतुकी कृपा है । मेरे द्वारा की जा रही आपकी भक्ति अत्यन्त हल्के स्तर की है ।
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अतः मैं मेरे द्वारा किये गये अनंतों-अनंतों पापों के भार को उस निर्बल भक्ति रूपी नौका में रखकर पार होने में समर्थ नहीं हूँ । मैं भवसागर ने बुरी तरह फँस गया हूँ जबकि आप भारी से भारी भार रूपी पापों को भी ढोने में समर्थ हो । अतः आपको जैसे उचित लगे, वैसे ही मुझ डूबते हुए को इस संसार से पार करो ।
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हे मुरारी देव ! आपने पूर्व में अनेकों फँसे हुए, उलझे हुए जीवों को निकाला है । अतः अब मुझे पार करने के अवसर पर सोते मत पड़े रहो, निःचेष्ट मत रहो । हे प्रभो ! सावधान होवो तथा मेरे जीवन रूपी गाड़ी के जुवे में बैल बनकर तत्काल जुत जाओ और मुझे अपनी अहैतुकी कृपा करके जन्ममरण के चक्र से पूर्ण रूप से विमुक्त कर दो ॥७०॥

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